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समस्तीपुर स्थित उत्तर बिहार की एकमात्र चालू जूट मिल में फिर से बजा सायरन, मजदूरों ने कहा- “सायरन बजाकर रस्म अदायगी, कच्चा माल नदारद”

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समस्तीपुर : उत्तर बिहार की एकमात्र चालू जूट मिल ‘रामेश्वर जूट मिल’ (मुक्तापुर) में पूरे 7 महीने और 10 दिन के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर भोंपू (सायरन) गूंज उठा है। दरभंगा के उप श्रम आयुक्त राकेश रंजन, श्रम अधीक्षक संजय पासवान, पर्सनल मैनेजर फ्रांको घोष, कमर्शियल मैनेजर एसके जैन और मजदूर यूनियन के अध्यक्ष नौशाद आलम व महासचिव अमरनाथ सिंह ने संयुक्त रूप से मिल का सायरन बजाकर इसके दोबारा खुलने का एलान किया। सायरन की आवाज सुनते ही पिछले कई महीनों से दाने-दाने को तरस रहे श्रमिकों के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई।

आगामी 16 जुलाई से शुरू होगा उत्पादन :

उप श्रम आयुक्त ने मिल परिसर में मौजूद श्रमिकों को संबोधित करते हुए बताया कि आगामी 16 जुलाई से मिल में उत्पादन कार्य शुरू कर दिया जाएगा। इससे पहले मिल प्रबंधन और मान्यता प्राप्त श्रमिक यूनियन के प्रतिनिधियों के बीच श्रम उपायुक्त के कक्ष में कई दौर की मैराथन वार्ता हुई। बैठक में मिल प्रबंधन ने श्रमिकों के सभी बकाए का भुगतान करने और उनकी जायज मांगों को पूरा करने का लिखित आश्वासन दिया, जिसके बाद मिल में जारी गतिरोध समाप्त हुआ और इसे दोबारा खोलने पर सहमति बनी।

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सायरन बजाकर रस्म अदायगी, कच्चा माल नदारद :

विगत सात महीनों से बंद पड़ी इस मिल का ताला खोलने के लिए सायरन बजाकर मिल को चालू तो कर दिया, लेकिन ग्राउंड जीरो पर सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है। मजदूरों का कहना है कि किसी भी जूट मिल में उत्पादन शुरू करने के लिए सबसे पहले कच्चे जूट (कच्चा माल) की जरूरत होती है। वर्तमान में मिल परिसर में कच्चे माल का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है। ऐसे में यह गंभीर प्रश्न खड़ा होता है कि बिना कच्चे माल के मिल में उत्पादन आखिर कैसे शुरू होगा?

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आम मजदूरों की मानें तो मिल को चालू करने का यह पूरा घटनाक्रम महज एक ‘स्वांग’ है। खुद प्रबंधन और मजदूर संघ के बयानों के मुताबिक, मिल का सायरन भले ही बज गया हो, लेकिन मजदूरों को वास्तव में काम पाने के लिए अभी महीनों का इंतजार करना पड़ेगा। आरोप है कि प्रबंधन अपनी सुविधानुसार मिल को खोलता और बंद करता रहता है। जब भी मजदूर अपने हक और बकाए की आवाज उठाते हैं, तो मिल को बंद कर उनकी आवाज को दबा दिया जाता है।

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मजदूरों के अनुसार, असली मिल उसी दिन चालू मानी जाएगी, जब उनका लंबित बकाया भुगतान अद्यतन किया जाए, उन्हें नियमित काम मिले और दिहाड़ी सुचारू रूप से जारी रहे। मजदूरों की सबसे बड़ी पीड़ा उनका रुका हुआ पैसा है। मिल में कार्यरत और सेवानिवृत्त मजदूरों का ईपीएफ और ग्रेच्युटी का भुगतान साल 2010 से ही लंबित है। स्थिति इतनी दयनीय है कि पिछले 16 वर्षों से अपने हक की गाढ़ी कमाई की राह देखते-देखते कई मजदूर इस दुनिया से भी चल बसे, लेकिन प्रबंधन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।

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1700 से अधिक श्रमिक प्रभावित :

मुक्तापुर स्थित यह जूट मिल पहले भी कई बार तालाबंदी का शिकार हो चुकी है:

पहली बार: 6 जुलाई 2017 को प्रबंधन ने मिल में तालाबंदी की थी, जो लंबे समय तक खिंची।

दूसरी बार: सितंबर-अक्टूबर 2020 में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की पहल पर मिल खुली, पर कुछ ही महीनों में फिर बंद हो गई।

तीसरी बार: नवंबर 2022 में श्रमिकों के बड़े आंदोलन के बाद फिर से संचालन रोकना पड़ा था।

मौजूदा स्थिति: पिछले साल 1 नवंबर 2025 को जब मिल में दोबारा ताला लटका, तब वहां 800 से अधिक श्रमिक सीधे तौर पर कार्यरत थे। मिल के सरकारी रिकॉर्ड में कुल नामांकित श्रमिकों की संख्या 1700 से अधिक है, जिनके सामने पिछले 7 महीनों से रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा था।

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एक घंटे की देरी से बजा सायरन :

तय कार्यक्रम के अनुसार, बुधवार को दिन में ठीक 11:00 बजे मिल का भोंपू बजाया जाना था। नियत समय पर श्रमिक, यूनियन प्रतिनिधि और अधिकारी भी पहुंच चुके थे, लेकिन ऐन वक्त पर बिजली गुल हो गई। विद्युत विभाग के पदाधिकारियों ने बताया कि 33 हजार वोल्ट की मुख्य आपूर्ति लाइन (33KV) पर एक पेड़ गिर जाने से पूरे क्षेत्र की बिजली व्यवस्था चरमरा गई थी। इसके करीब एक घंटे बाद, बिजली बहाल होने पर सायरन बजाकर मिल खोलने की आधिकारिक औपचारिकता पूरी की गई।

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