समस्तीपुर में कृषि विभाग में सरकारी नौकरी का झांसा देकर बंधक बनाए गए 105 युवक-युवतियां मुक्त, 46 नाबालिग भी शामिल, गिरोह के 9 लोग हिरासत में

समस्तीपुर : कृषि विभाग में सरकारी नौकरी दिलाने का झांसा देकर विभिन्न राज्यों से लाकर बंधक बनाकर रखे गए 105 युवक-युवतियों एवं नाबालिगों को गुरुवार सुबह एक बड़े संयुक्त रेस्क्यू अभियान में मुक्त कराया गया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, मिशन मुक्ति फाउंडेशन, एसएसबी और समस्तीपुर पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में बुधवार की देर रात से गुरुवार की सुबह तक चले अभियान के दौरान गिरोह से जुड़े नौ संदिग्धों को हिरासत में लिया गया। मुक्त कराए गए लोगों में 67 युवक और 38 युवतियां शामिल हैं, जिनमें 46 नाबालिग भी हैं। सभी को विभिन्न सुरक्षित स्थलों से निकालकर सत्यापन के लिए मुफस्सिल थाना लाया गया।
रातभर चला अभियान, 150 से अधिक पुलिसकर्मी रहे तैनात :
बुधवार रात करीब 12 बजे शुरू हुआ रेस्क्यू ऑपरेशन गुरुवार सुबह सात बजे तक चला। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो के निर्देश पर मिशन मुक्ति फाउंडेशन के निदेशक वीरेंद्र कुमार सिंह, रेस्क्यू एंड रिलीफ फाउंडेशन के सिद्धांत घोष, एसएसबी तेजपुर तथा अन्य सामाजिक संगठनों की टीम ने समस्तीपुर पुलिस के सहयोग से धरमपुर, मुसापुर समेत करीब दस ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। अभियान में साइबर डीएसपी दुर्गेश दीपक, महिला थाना, मुफस्सिल थाना सहित आसपास के आधा दर्जन थानों की पुलिस और पुलिस लाइन के 150 से अधिक जवान शामिल रहे।

असम से लेकर बंगाल तक के युवाओं को बनाया गया शिकार :
प्राथमिक जांच में सामने आया है कि असम, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के गरीब एवं पिछड़े क्षेत्रों के युवाओं को कृषि विभाग में सरकारी नौकरी दिलाने का लालच दिया गया था। असम के तामुलपुर, मंगलदोई, भैरभकुंड, उदलगुरी, तिनसुकिया और दिमाकुची जैसे भारत-भूटान सीमा से सटे इलाकों से भी बड़ी संख्या में युवक-युवतियों को लाया गया था। आरोप है कि नौकरी दिलाने के नाम पर प्रत्येक अभ्यर्थी से लगभग 25 हजार रुपये वसूले जिते थे और फिर उन्हें समस्तीपुर शहर के विभिन्न ठिकानों पर रख दिया जाता था। उनके मूल प्रमाण-पत्र भी अपने कब्जे में ले लिए जाते थे। पीड़ितों ने रेस्क्यू टीम को बताया कि उन्हें कथित रूप से एक कॉल सेंटर में काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। उनसे अन्य बेरोजगार युवाओं को जोड़ने और उनसे भी पैसे जमा कराने का दबाव बनाया जाता था।

पीड़ितों के अनुसार उन पर 24 घंटे निगरानी रखी जाती थी। रात में कमरों को बाहर से बंद कर दिया जाता था और मोबाइल फोन जब्त कर लिए जाते थे। घर जाने या नौकरी छोड़ने की बात करने पर मारपीट और धमकी दी जाती थी। कई लोगों को तय वेतन भी नहीं दिया गया तथा मानसिक रूप से भयभीत कर नियंत्रण में रखा जाता था। छापेमारी के दौरान गिरोह से जुड़े नौ संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है। पुलिस पूरे नेटवर्क की गहन जांच कर रही है। यह पता लगाया जा रहा है कि गिरोह का संचालन कौन कर रहा था, इसके तार किन राज्यों से जुड़े हैं और यह नेटवर्क कब से सक्रिय था।

सदर एसडीपीओ-1 सह एएसपी संजय कुमार पांडेय ने बताया कि मुक्त कराए गए नाबालिगों को बाल कल्याण समिति सीडब्ल्यूसी के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जबकि बालिग युवक-युवतियों को सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनके घर भेजा जाएगा। पुलिस इस मामले की जांच मानव तस्करी, अवैध रूप से बंधक बनाकर रखने, धोखाधड़ी, ठगी तथा अन्य आपराधिक धाराओं के तहत कर रही है। अधिकारियों ने युवाओं और अभिभावकों से नौकरी के नाम पर किसी भी अनजान व्यक्ति या संस्था के झांसे में नहीं आने की अपील की है।

बता दें कि इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब पीड़ित परिवारों ने एसएसबी के क्षेत्रक मुख्यालय बेजपारा, मंगलदोई में तैनात इंस्पेक्टर मनोज कुमार शर्मा को ईमेल और पत्र भेजकर अपने बच्चों के फंसे होने की जानकारी दी गयी। शिकायत मिलने के बाद एसएसबी ने जांच शुरू की और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, मिशन मुक्ति फाउंडेशन तथा अन्य एजेंसियों से संपर्क स्थापित किया। इसके बाद एनएचआरसी के हस्तक्षेप पर बड़े पैमाने पर संयुक्त रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया, जिसमें सभी 105 युवक-युवतियों को सुरक्षित मुक्त कराया गया।

