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होली पर परदेसों से घर जाने के लिए लोगों को ट्रेनों में सीटें नहीं मिल रही हैं। कई ट्रेनों में तो 24 अप्रैल तक किसी भी श्रेणी में कोई सीट नहीं है। ऐसी स्थिति में टिकट पाना बड़ी चुनौती है। लंबी वेटिंग लिस्ट और सीटों की कमी के कारण कई लोगों को अपनी यात्रा रद करनी पड़ रही है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, अमृतसर आदि शहरों से दरभंगा, मधुबनी और समस्तीपुर के लिए लगभग सभी ट्रेनों में कन्फर्म टिकट मिलना लगभग असंभव हो गया है।
स्लीपर से लेकर थर्ड एसी, सेकंड एसी और फर्स्ट क्लास तक की सीटें भर चुकी हैं। वेटिंग लिस्ट 150 से 250 के पार पहुंच गई है, जिससे यात्रियों में चिंता और निराशा बढ़ती जा रही है। होली हो या दीवाली… अब तो देश में मनाए जाने वाले किसी भी बड़े त्योहार पर ट्रेनों में कन्फर्म सीट न मिल पाना अब आम समस्या बन चुकी है। यात्रा की तारीख से करीब एक महीने पहले ही ज्यादातर ट्रेनों में नो रूम की स्थिति दिखाई देने लगती है। वेटिंग लिस्ट लंबी हो जाती है और कन्फर्म टिकट मिलना मुश्किल होता जाता है। यात्रियों का कहना है कि, हर साल त्योहारों के समय ऐसे हालात बनते जा रहे हैं। खास बात ये है कि, समस्या के समाधान पर किसी जिम्मेदार का ध्यान नहीं है।
होली नजदीक आते ही प्रवासी मजदूरों, छात्रों और नौकरीपेशा लोगों की घर वापसी शुरू हो जाती है। लेकिन इस बार लाखों प्रवासियों के लिए त्योहार की खुशी चिंता में बदल गई है। खासकर दरभंगा, मधुबनी और उत्तर बिहार के जिलों की ओर आने वाले यात्रियों की स्थिति बेहद दयनीय बनी हुई है। कई यात्रियों का कहना है कि महीनों पहले टिकट बुक कराने के बावजूद उन्हें कन्फर्म सीट नहीं मिल सकी।
टिकट की भारी मांग के कारण तत्काल कोटा भी कुछ ही मिनटों में फुल हो जा रहा है। आनलाइन बुकिंग के दौरान सर्वर स्लो और भारी ट्रैफिक की शिकायतें सामने आ रही हैं, जिससे यात्रियों को बार-बार निराशा हाथ लग रही है।
आरक्षित टिकट नहीं मिलने के कारण बड़ी संख्या में यात्री जनरल डिब्बों में सफर करने को मजबूर हैं। जनरल कोचों में क्षमता से अधिक भीड़ के कारण यात्रियों को खड़े होकर यात्रा करनी पड़ रही है। स्टेशनों पर टिकट काउंटरों के बाहर लंबी कतारें देखी जा रही हैं।
रेल टिकट की किल्लत का असर अन्य परिवहन साधनों पर भी पड़ा है। निजी बस ऑपरेटरों ने किराया बढ़ा दिया है, जबकि हवाई किराए में भी त्योहार को देखते हुए वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे आम यात्रियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
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