हमें एक सीट मिलनी चाहिए…बिहार MLC सीट शेयरिंग पर NDA में मांझी ने फंसाया पेच, बोले- बीजेपी नेतृत्व से बात करेंगे

बिहार विधान परिषद की 9 सीटों के लिए चुनाव की घोषणा होते ही राज्य में सियासी पारा चढ़ गया है. विधायक कोटे की इन 9 सीटों पर होने वाले चुनाव ने एनडीए में आंतरिक खींचतान और बयानबाजी तेज कर दी है. इनमें पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का बयान सबसे अहम है. बता दें कि मांझी ने एक सीट की मांग की है. उन्होंने कहा हमारी मांग पहले से है और मैं आज भी फिर मांग कर रहा हूं कि हमें एक सीट मिलता है तो बहुत अच्छा रहेगा. हमें एक सीट मिलना चाहिए और हम भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से दिल्ली जाकर पूरे मामले पर बातचीत करेंगे.
जीतन राम मांझी ने कहा कि अगर हमें एक सीट मिलती है तो निश्चित तौर पर एनडीए में और अच्छे तरीके से कोआर्डिनेशन बना रहेगा, और हम गठबंधन के प्रति हमेशा समर्पित रहते हैं और रहेंगे. बता दें कि मांझी का बयान ऐसे वक्त आया है जब बीजेपी, जेडीयू और सहयोगी दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर अंदरखाने मंथन चल रहा है. सवाल अब यही है कि क्या एनडीए के भीतर सबकुछ सहज है या फिर सीटों को लेकर दबाव की राजनीति शुरू हो चुकी है?

बता दें कि भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार, इन सीटों पर 1 जून से 8 जून के बीच नामांकन होगा, 9 जून को स्क्रूटनी होगी और 11 जून तक नाम वापस लिए जा सकेंगे. 18 जून को मतदान होगा और 20 जून तक चुनावी प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी, क्योंकि वर्तमान 9 सदस्यों का कार्यकाल 28 जून को समाप्त हो रहा है. लेकिन, विधायक कोटे की इन 9 सीटों पर होने वाले चुनाव ने एनडीए में आंतरिक खींचतान और बयानबाजी तेज कर दी है .

जिन 9 सीटों पर चुनाव होना है, वे सभी विधानसभा के विधायकों के वोटों से चुनी जानी हैं . वर्तमान में जिनका कार्यकाल खत्म हो रहा है, उनमें जेडीयू की कुमुद वर्मा और प्रोफेसर गुलाम गौस, आरजेडी के मोहम्मद फारूख और सुनील कुमार सिंह, बीजेपी के भीष्म साहनी और संजय प्रकाश उर्फ संजय मयूख और कांग्रेस के समीर कुमार सिंह शामिल हैं. इनके अलावा, जेडीयू के भगवान सिंह कुशवाहा और वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा नवंबर 2025 में दिए गए इस्तीफों के कारण खाली हुई सीटों पर भी यह चुनाव कराया जा रहा है.

बता दें कि विधानसभा में विधायकों की मौजूदा संख्या के हिसाब से एनडीए और पाला बदल चुके विपक्षी दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर शह और मात का खेल शुरू हो गया है. ऐसे में यह चुनाव सिर्फ औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बिहार की नई राजनीतिक सेटिंग का संकेत भी माना जा रहा है. साफ है कि जीतन राम मांझी का बयान सीधे तौर पर एनडीए के भीतर सीट शेयरिंग पर दबाव की राजनीति माना जा रहा है.

बता दें कि हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा भले छोटी पार्टी हो, लेकिन बिहार में महादलित राजनीति में उसका अपना प्रभाव माना जाता है. मांझी लगातार यह संदेश देने की कोशिश करते रहे हैं कि गठबंधन में उनकी पार्टी को सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए. उन्होंने साफ कहा कि वह दिल्ली जाकर बीजेपी नेतृत्व से बात करेंगे. इसका मतलब साफ है कि ‘हम’ इस बार प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक राजनीतिक हिस्सेदारी चाहती है.

एनडीए के भीतर सबसे बड़ी चुनौती सीटों के संतुलन की है. बीजेपी और जेडीयू दोनों अपने-अपने नेताओं को एडजस्ट करना चाहती हैं. कई वरिष्ठ नेता राज्यसभा और विधान परिषद दोनों जगह अवसर तलाश रहे हैं. ऐसे में सहयोगी दलों की मांगों को पूरा करना आसान नहीं होगा.

अगर HAM को सीट दी जाती है तो किसी बड़े दल को अपने हिस्से में कटौती करनी पड़ सकती है. यही वजह है कि अंदरखाने बातचीत और लॉबिंग तेज हो गई है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधान परिषद चुनाव भले संख्या बल के लिहाज से आसान दिखता हो, लेकिन इसके जरिए आने वाले विधानसभा चुनाव का राजनीतिक संदेश तय होगा.
