समस्तीपुर में 33 कोचिंग सेंटर रजिस्टर्ड लेकिन सिर्फ 6 के पास ही फायर एनओसी

समस्तीपुर : लखनऊ के एक कोचिंग संस्थान में आग लगने से पंद्रह छात्र-छात्राओं की मौत के दृष्टिगत शहर में कोचिंग सेंटरों का निरीक्षण जारी है। निरीक्षण के दौरान अधिकतर कोचिंग तंग रास्तों के बीच भवनों में संचालित मिलीं। जिनमें आपातकालीन निकास का कोई इंतजाम नहीं पाया गया। आग से लड़ने व्यवस्था भी नाकाफी पाई गई। सदर अनुमंडल अग्निशमन पदाधिकारी ज्योति कुमारी ने बताया कि शहर में सिर्फ 6 कोचिंग संस्थानों ने ही फायर एनओसी प्राप्त किया है। जबकी शहर के भी हजारों छोटे-बड़े कोचिंग सेंटर संचालित है।
शहर के भीतर गली-मोहल्लों से लेकर व्यावसायिक भवनों तक में कोचिंग संस्थान चल रहे हैं। जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग, अग्निशमन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी इनकी कोई सुध नहीं ले रहे हैं। ऐसे में विद्यार्थियों की जिंदगी दांव पर है। अब एक बार फिर दोनों की विभागों की ओर से अभियान भी खानापूर्ति ही बनकर रह गया। हर बड़ी घटना के बाद ऑडिटिंग का काम जोर-शोर से शुरू होता है लेकिन कुछ ही हफ्तों में जांच ठंडी पर जाती है। कारवाई के नामपर बस नोटिस थमा दिया जाता है।
शहर में पंजीकृत कोचिंग सेंटर की संख्या मात्र 16 है,जबकि घरों, दुकानों में बिना पंजीकरण के भी बड़ी संख्या में कोचिंग और लाइब्रेरी चल रही हैं। इनमें से कुछ को छोड़कर बाकी का शायद ही कभी किसी विभाग ने निरीक्षण किया होगा। ज्यादातर में विद्यार्थियों की संख्या भी 50 से अधिक है। कई कोचिंग में तो यह संख्या 200 से 500 के पार तक भी है। इसके बावजूद आग से बचाव के इंतजाम नाकाफी है।

शिक्षा विभाग से मिली जानकारी के अनुसार जिले में हजारों की संख्या में चलने वाले कोचिंग सेटरों में मात्र 33 का ही पंजीकरण है। इसमें सबसे गजब बात यह है कि इन 33 के पास भी अग्निशमन विभाग की एनओसी नहीं है। यह साफ कहा जा सकता है कि जिले में बिना फायर एनओसी के कोचिंग सेटर संचालित हो रहे है। इधर अग्निशमन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार शहर में 6 कोचिंग ने अब तक अग्निशमन एनओसी प्राप्त किया है।
घरों और में चल रहे कोचिंग और लाइब्रेरी :
जिले में कई घरों में बड़ी संख्या में अवैध तरीके से लाइब्रेरी संचालित हो रही हैं। इनका शिक्षा विभाग में पंजीकरण भी नहीं है। विद्यार्थियों के मुताबिक, घरों में ग्राउंड फ्लोर पर लाइब्रेरी चल रही हैं, जबकि दूसरी मंजिल पर परिवार रहते हैं। कई सेंटरों के एंट्री (प्रवेश) और एग्जिट (निकास) मार्ग इतने ज्यादा संकरे हैं कि दो लोग भी एक साथ ठीक से नहीं निकल सकते। हद तो यह है कि दर्जनों केंद्रों में आने और जाने के लिए केवल एक ही मुख्य द्वार है। यदि मुख्य द्वार के पास शॉर्ट-सर्किट होता है, तो बच्चों के पास बाहर भागने का कोई दूसरा रास्ता नहीं बचेगा।

पिछले हादसे से सबक नहीं, एक-दूसरे पर फेंक रहे जबावदेही :
यह पहला मौका नहीं है जब किसी हादसे के बाद प्रशासन जागा हो। पिछले दिनों मुजफ्फरपुर स्थित एक हाॅस्पीटल में आग लगने की घटना के बाद भी समस्तीपुर शहर में अभियान चलाकर होटलों की जांच की थी। उस दौरान दर्जनों होटलों को विभिन्न खामियों के चलते नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन एक भी होटल पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी। नतीजा यह रहा कि अधिकांश प्रतिष्ठान आज भी उसी व्यवस्था में संचालित हो रहे हैं। कई संस्थानों में फायर एनओसी नहीं थी तो कहीं आपातकालीन निकास और अग्निशमन उपकरण तक मानकों के अनुरूप नहीं मिले।

सदर एसडीओ दिलीप कुमार द्वारा ऐसे अस्पतालों का निरीक्षण कर नोटिस जारी हुए, चेतावनियां दी गईं, तथा रजिस्ट्रेशन फेल मिलने पर सिविल सर्जन को भी कारवाई के लिये पत्र लिखा गया लेकिन कार्रवाई ठंडे बस्ते में चली गई। इस संबंध में सदर एसडीओ दिलीप कुमार ने बताया कि रजिस्ट्रेशन फेल अस्पतालों पर कार्रवाई के लिये सिविल सर्जन को लिखा गया है। अब तक कोई कार्रवाई नहीं होने की जानकारी मिली है, रिमाइंडर पत्र फिर से भेजा जाएगा। वहीं दूसरी ओर सिविल सर्जन डॉ. राजीव कुमार ने बताया कि नियमतः कार्रवाई की प्रक्रिया होगी। लेकिन बड़ा सवाल की आखिर रजिस्ट्रेशन फेल अस्पतालों पर सिविल सर्जन कारवाई से क्यों कतरा रहे हैं।


