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बिहार में कैसे गठबंधन बना सियासत की मजबूरी? कर्पूरी ठाकुर से नीतीश-लालू तक की कहानी पढ़े…

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बिहार में छह दशक पहले ही गठबंधन की सियासत का पहला प्रयोग 1967 में हुआ था। उस समय कांग्रेस के खिलाफ कई दल एकजुट हुए थे। तब कांग्रेस काफी मजबूत थी। इसके बाद से बिहार में गठबंधन की सियायत का विस्तार होता गया। आज गठबंधन की प्रासंगिकता बढ़ गयी है। ऐसे बिहार में जब-जब गठबंधन ने आकार लिया है और उसके पास बड़ा चेहरा रहा है, उसने सफलता हासिल की है। महामाया प्रसाद सिन्हा, कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार इसके प्रमाण हैं।

ऐसे तो आजादी के बाद 1952 में हुए पहले आम चुनाव के महज एक दशक बाद ही बिहार में गठबंधन की राजनीति की सुगबुगाहट होने लगी थी। आजादी के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत रही। देश और राज्यों में वह सर्वमान्य पार्टी की तरह थी। कोई एक राजनीतिक दल उसे परास्त करना तो दूर, उसे टक्कर देने की स्थिति में भी नही आ पाया। लिहाजा, छोटी-छोटी राजनीतिक पार्टियों ने मिलकर कांग्रेस को चुनौती देने की योजना पर काम शुरू किया। डेढ़ दशक बाद 1967 में इसने पहली बार आकार लिया और कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में सफलता हासिल की।

महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। इसे संविद सरकार भी कहा गया। इसमें जन क्रांति दल, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय जनसंघ, कुछ वामदल शामिल हुए। कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री बने। लेकिन आंतरिक विवादों के कारण सरकार आगे नहीं चल सकी। 1968 में ही सरकार गिर गयी। इसके बाद अस्थिरता बनी रही। हालांकि इस अस्थिरता के बीच भी गठबंधन का दौर चलता रहा। पर सरकारें अस्थिर ही रहीं।

वर्ष 1967 से 1973 के बीच छह वर्षों में 10 मुख्यमंत्री बने। महामाया प्रसाद सिन्हा 329 दिन के लिए, सतीश प्रसाद सिंह 5 दिन, बीपी मंडल 51 दिन, भोला पासवान शास्त्री पहले 100 दिन फिर 13 और 222 दिनों के लिए, हरिहर सिंह 117, दारोगा प्रसाद राय 310 दिन, कर्पूरी ठाकुर 163 दिन, केदार पांडेय 1 वर्ष 105 दिन के लिए मुख्यमंत्री बने। इस अवधि में छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल सरकार में बड़ी भूमिका और बड़े लाभ के लिए जोड़-तोड़ करते रहे। इस बीच कांग्रेस की बढ़ती ताकत देख कई छोटे और क्षेत्रीय दलों ने राष्ट्रीय स्तर पर जनता पार्टी बनाया। 1977 में इसकी सरकार बनी। बिहार में कर्पूरी ठाकुर सीएम बने। पर, राजनीतिक व व्यक्तिगत हित हावी रहे। खींचतान चलती रही। 1979 में सरकार फिर गिर गयी। रामसुंदर दास मुख्यमंत्री बने। 1980 में चुनाव में कांग्रेस की वापसी हुई। एक दशक की पारी फिर कांग्रेस ने खेली।

वर्ष 1990 में बिहार में फिर से गठबंधन का नया दौर शुरू हुआ। इस दौर में पहले लालू प्रसाद का फिर नीतीश कुमार का अभ्युदय हुआ। ये दोनों नेता बिहार में गठबंधन की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण चेहरा बन गए। आगे चलकर नीतीश कुमार बिहार में गठबंधन की राजनीति के सबसे बड़े चेहरे के साथ-साथ बिहार की सियासत के धुरी बन गए। लालू प्रसाद ने 1990 में भाजपा और वामदल के समर्थन से जनता दल की सरकार बनायी। इसके बाद तो गठबंधन का दौर विस्तार ही पाता गया। 1998 में एनडीए गठबंधन बना।

वर्ष 2000 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन की सरकार बनी। लेकिन यह सरकार केवल सात दिनों तक ही चल सकी। नीतीश सरकार गिर गयी। इस दौर तक कांग्रेस कमजोर हो चुकी थी। वह मुख्य ताकत भी नहीं रही। डॉ. जगन्नाथ मिश्रा 1990 में कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री बने। इसके बाद कांग्रेस की ताकत तेजी से कम होती गयी। हाल यह हो गया कि उसके बाद कांग्रेस अपने बूते कुछ करने की स्थिति में नहीं रही। एक ओर लालू प्रसाद और दूसरी ओर नीतीश कुमार ने अपना-अपना कद बड़ा कर लिया। ये दोनों बिहार की राजनीति के केन्द्र बन गए। कांग्रेस अप्रासंगिक होने लगी। जदयू-भाजपा नयी ताकत बनकर उभरी।

इस बीच लालू प्रसाद ने भी 1997 में जनता दल से बाहर आकर राष्ट्रीय जनता दल बना लिया। इसके पहले 1996 में कांग्रेस लालू प्रसाद के नजदीक आई। लालू प्रसाद ने कांग्रेस और वामदलों के साथ अपनी ताकत बढ़ायी और सरकार भी बनायी। 1998 में कांग्रेस लालू प्रसाद की पार्टी के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ी। उधर, कांग्रेस के सहयोग से 2004 तक लालू प्रसाद ने बिहार में अपनी सरकार चलायी। राबड़ी देवी अन्य राजनीतिक दलों के सहयोग से मुख्यमंत्री बनी रही। 2004 में यूपीए का गठन हुआ। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर तो इसकी ताकत बढ़ी, लेकिन बिहार में नीतीश कुमार ने एनडीए को काफी मजबूत बना दिया। उनके नेतृत्व में 2005 में ही बिहार का परिदृश्य पूरी तरह बदल गया।

2004 के बाद एनडीए गठबंधन की ताकत बढ़ने लगी। इसके नेता नीतीश कुमार का राजनीतिक कद और उनकी लोकप्रियता भी तेजी से बढ़ी। 2005 में एनडीए गठबंधन ने अपनी सरकार बनायी। 2010 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को अभूतपूर्व सफलता मिली। 2013 में नीतीश कुमार पहली बार एनडीए से अलग हुए और 2014 का लोकसभा चुनाव अपने बूते लड़ा। हालांकि इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। उधर, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए ने बिहार में शानदार सफलता प्राप्त की। लेकिन अगले ही साल विधानसभा चुनाव में परिदृश्य बदल गया। नीतीश कुमार का जदयू और लालू प्रसाद का राजद साथ आया। कांग्रेस के सहयोग से इन्होंने महागठबंधन बनाया और विधानसभा चुनाव में इसने शानदार सफलता प्राप्त की।

नीतीश कुमार बिहार में किसी भी गठबंधन के लिए मजबूरी बन गए। वे जिधर रहे, जीत उसकी ही हुई। जब वे एनडीए के साथ रहे तो उसकी भारी जीत हुई। लेकिन, जब वे दूसरी तरफ गए तो उसने भी जबरदस्त जीत हासिल की। वर्ष 2015 विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार का बड़ा कारण उसके पास बड़ा चेहरा का न होना था। उधर, नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव लड़कर महागठबंधन ने शानदार सफलता हासिल की। 2017 में नीतीश कुमार महागठबंधन से फिर एनडीए में वापस आ गए। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने 40 में से 39 सीटें जीत ली।

2020 में हुआ सबसे बड़ा गठबंधन

वर्ष 2020 में बिहार में सबसे बड़ा गठबंधन हुआ। एनडीए में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जदयू, भाजपा, हम, वीआईपी एक ओर थे जबकि दूसरी ओर तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद, कांग्रेस, माले, सीपीआई, सीपीएम यूपीए का हिस्सा बने। उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा और चिराग पासवान की लोजपा ने अलग राह ली। एनडीए और यूपीए गठबंधनों के बीच जबरदस्त टक्कर हुई। यहां भी फैक्टर नीतीश कुमार ही रहे। उनके नेतृत्व में एनडीए को जीत मिली।

लेकिन, 2022 में बिहार की राजनीति ने फिर करवट बदली। नीतीश कुमार का जदयू फिर से महाठबंधन में शामिल हो गया। राजद, जदयू, कांग्रेस, माले, सीपीआई, सीपीएम एक बैनर के नीचे आई। उपेन्द्र कुशवाहा ने नयी पार्टी बनायी। एनडीए में कुशवाहा और जीतम राम मांझी की वापसी हुई।

West Bengal CM Mamata Banerjee, Bihar CM Nitish Kumar and RJD chief Lalu Prasad Yadav during the INDIA meeting | PTI
नीतीश की पहल पर बना इंडिया गठबंधन

अब एनडीए को टक्कर देने के लिए महागठबंधन को नया नाम देते हुए इंडिया गठबंधन बनाया गया है। नीतीश कुमार की पहल पर वर्ष 2023 में राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों का नया गठबंधन ‘इंडिया’ सामने आया। अब यह एनडीए को टक्कर देने को तैयार है। इसमें जदयू, राजद, कांग्रेस, माले, सीपीआई, सीपीएम शामिल हैं। लोकसभा चुनाव में दोनों गठबंधन फिर से आमने-सामने होंगे।

टक्कर देने को छोटे गठबंधन भी बने

बिहार में छोटे गठबंधन भी खूब बने। एनडीए और यूपीए को टक्कर देने के लिए कई छोटी-छोटी राजनीतिक पार्टियां आपस में मिली और गठबंधन तैयार किया। 2020 के विधानसभा चुनाव में तीन गठबंधन टकराए। एक ओर एनडीए में जदयू-भाजपा, जीतन राम मांझी की हम और मुकेश सहनी की वीआईपी थी तो दूसरी ओर यूपीए में राजद, कांग्रेस, माले, सीपीआई, सीपीएम और तीसरी ओर उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा, बसपा और ओबैसी की एआईएमआईएम ने मिलकर लड़ा।

Avinash Roy

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