एक ही आदमी बिहार और झारखंड पुलिस में अलग-अलग नामों से कर रहा था नौकरी, सुप्रीम कोर्ट ने दिया आपराधिक कार्रवाई का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने उस पुलिस कॉन्स्टेबल की सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को सही करार दिया है, जिसने झारखंड पुलिस से दो दिनों की छुट्टी लेकर जाली पहचान के साथ बिहार पुलिस में भी नौकरी हासिल कर ली थी। सुप्रीम कोर्ट ने कॉन्स्टेबल के इस कृत्य पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि सरकारी सेवाओं में इस तरह की धोखाधड़ी और अनुशासनहीनता के लिए कोई स्थान नहीं है।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने झारखंड हाईकोर्ट के उस फैसले को शुक्रवार को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी कॉन्स्टेबल रंजन कुमार को पुलिस सेवा से बर्खास्त करने के अनुशासनात्मक प्राधिकारी के आदेश को खारिज कर दिया गया था।

क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, कामता सिंह के पुत्र रंजन कुमार को 18 मई 2005 को झारखंड पुलिस में कॉन्स्टेबल के रूप में नियुक्त किया गया था। धुरकी पुलिस स्टेशन में रिजर्व गार्ड के रूप में सेवा करते समय उसे 20 दिसंबर 2007 से 22 दिसंबर 2007 तक दो दिनों की क्षतिपूरक छुट्टी दी गई थी। हालांकि, छुट्टी खत्म होने के बाद वह 23 दिसंबर को ड्यूटी पर नहीं लौटा और बिना सूचना के अनुपस्थित रहा।

जांच में पाया गया कि इसी अनुपस्थिति के दौरान रंजन कुमार ने 26 दिसंबर 2007 को बिहार में ‘संतोष कुमार पिता कामता शर्मा’ के नाम से और जाली प्रमाणपत्रों व फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कॉन्स्टेबल की नौकरी हासिल कर ली थी। इसके बाद उसने 6 जनवरी 2008 को बिना किसी अनुमति के पटना जिला पुलिस की ड्यूटी भी छोड़ दी थी।

जांच में ये आरोप हुए साबित
सीनियर एसपी पटना और एसपी जहानाबाद की कराई गई जांच रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि रंजन कुमार और संतोष कुमार वास्तव में एक ही व्यक्ति थे। झारखंड पुलिस की विभागीय जांच में धोखाधड़ी, प्रतिरूपण (इम्पर्सनेशन), जालसाजी, धोखाधड़ी, ड्यूटी से अनधिकृत अनुपस्थिति और सेवा अनुशासन के उल्लंघन के आरोप साबित हुए।


