बिहार में सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर सरकार द्वारा पूर्ण प्रतिबंध के निर्णय का इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) बिहार शाखा ने खुलकर विरोध किया है. इस मुद्दे पर आईएमए बिहार ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को एक विस्तृत ज्ञापन भेजते हुए कहा है कि बिना प्रशासनिक और संरचनात्मक वास्तविकताओं को समझे इसे लागू करना राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. आईएमए ने साफ कहा है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और मरीजों को बेहतर सेवा देने की चिंता पूरी तरह जायज है, लेकिन इसका समाधान निजी प्रैक्टिस पर एक समान और पूर्ण रोक नहीं हो सकता.
‘इस्तीफा दे देंगे सरकारी डॉक्टर’:
आईएमए बिहार के पूर्व अध्यक्ष डॉ अजय कुमार ने कहा कि अगर सरकार बिना किसी विकल्प और प्रोत्साहन के सभी सरकारी डॉक्टरों पर निजी प्रैक्टिस बंद करने का फैसला लेती है, तो इससे अनुभवी डॉक्टरों का सरकारी सेवा से मोहभंग हो सकता है. बड़ी संख्या में वरिष्ठ चिकित्सक या तो इस्तीफा देकर निजी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की ओर रुख कर सकते हैं, या फिर दूसरे राज्यों में बेहतर अवसर तलाश सकते हैं. इसका सीधा असर बिहार के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की सेवाओं पर पड़ेगा.
डॉक्टरों का वेतन कम:
डॉ अजय कुमार ने बताया कि साल 1990 से 2000 के बीच में लालू यादव के शासनकाल में भी यह नियम लागू किया गया था, लेकिन लागू नहीं हो पाया था. 2006 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभालते ही सरकारी डॉक्टर के प्राइवेट प्रैक्टिस बंद करने को लेकर निर्णय लिया था, लेकिन लागू नहीं हो पाया. उन्होंने कहा कि वह यह जरूर चाहते हैं कि जो सरकारी डॉक्टर कार्यरत हैं,, वह सरकारी अस्पताल में अपना पूरा समय दें और मरीज का बेहतर इलाज करें. लेकिन डॉक्टरी एक ऐसा पेशा है जिसमें डॉक्टर को काफी पढ़ाई करनी पड़ती है और बहुत लेट से जॉब में आता है. ऐसे में उसकी पेमेंट अच्छी होनी चाहिए. जबकि बिहार में डॉक्टर की सैलरी अभी भी काफी कम है.
डॉक्टरों को विकल्प मिलना चाहिए:
डॉ अजय कुमार ने कहा कि आईएमए बिहार का मानना है कि राज्य के सभी सरकारी डॉक्टरों को दो स्पष्ट विकल्प दिए जाने चाहिए. पहला, वे निजी प्रैक्टिस पूरी तरह छोड़ दें और केंद्र सरकार के डॉक्टरों के समान एनपीए प्राप्त करें. दूसरा, वे घोषित शर्तों के साथ बिना एनपीए निजी प्रैक्टिस जारी रखें. इससे सरकारी अस्पतालों में उपस्थिति भी सुधरेगी और कुशल डॉक्टरों को सेवा में बनाए रखना भी संभव होगा. उनका और आईएमए बिहार का मानना है कि स्वास्थ्य प्रशासन से जुड़े अहम पदों जैसे सिविल सर्जन, अस्पताल अधीक्षक, मेडिकल कॉलेज प्राचार्य और विभागाध्यक्ष जैसे पदों को अनिवार्य रूप से नॉन प्रैक्टिसिंग घोषित किया जाए.
मेडिकल एजुकेशन कैडर पर असर पड़ेगा:
डॉ अजय कुमार ने चिंता जताते हुए कहा कि सरकार के निर्णय के अनुसार अगर पूर्ण प्रतिबंध लागू हुआ तो सबसे ज्यादा असर मेडिकल एजुकेशन कैडर पर पड़ेगा. राज्य के नए मेडिकल कॉलेजों में पहले से ही फैकल्टी की कमी एक बड़ी चुनौती है. ऐसे में वरिष्ठ शिक्षक और विशेषज्ञ डॉक्टर निजी मेडिकल कॉलेजों की ओर जा सकते हैं, जिससे नेशनल मेडिकल कमीशन के फैकल्टी मानकों का पालन करना मुश्किल हो जाएगा. इसका असर पढ़ाई, रिसर्च और पीजी प्रशिक्षण पर भी पड़ेगा.
डॉक्टर को सरकार द्वारा रूरल एरिया अलाउंस मिले:
डॉ अजय कुमार ने कहा कि केवल निजी प्रैक्टिस को समस्या की जड़ मानना सही नहीं होगा. ग्रामीण और दूरदराज के अस्पतालों में डॉक्टरों के लिए आवास की कमी, सुरक्षा व्यवस्था का अभाव, बुनियादी ढांचे की खराब स्थिति, पर्याप्त पैरामेडिकल स्टाफ की कमी और अत्यधिक प्रशासनिक बोझ जैसे कई कारण हैं, जो डॉक्टरों की नियमित उपस्थिति को प्रभावित करते हैं. इन सुविधागत कमियों को दूर किए बिना सिर्फ दंडात्मक कार्रवाई करना न तो व्यावहारिक होगा और न ही न्यायसंगत. ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर से अधिक दूरी पर स्थित अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर को सरकार द्वारा रूरल एरिया अलाउंस दिया जाना चाहिए.
कानूनी रूप से टिकाऊ नीति की मांग:
निगरानी और अनुशासन के मामले पर डॉ अजय कुमार ने स्पष्ट कहा कि वह औचक निरीक्षण, बायोमेट्रिक उपस्थिति और जियो-फेंसिंग जैसी तकनीकी व्यवस्था का समर्थन करते है. हालांकि किसी भी कार्रवाई में डॉक्टरों को स्पष्टीकरण और अपील का अधिकार मिलना चाहिए, ताकि मनमानी की गुंजाइश न रहे. उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग से आईएमए ने अपने ज्ञापन के जरिए सरकार से आग्रह किया है कि वह निजी प्रैक्टिस पर पूर्ण रोक लगाने के बजाय परामर्श आधारित, प्रोत्साहन से जुड़ी और कानूनी रूप से टिकाऊ नीति बनाए.
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