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अवसरवादी बाबा का विलाप; तेजस्वी यादव को नसीहत से शिवानंद तिवारी पर भड़के सुनील सिंह

राबड़ी देवी के मुंहबोले भाई राजद नेता सुनील कुमार सिंह ने नाम लिए बगैर शिवानंद तिवारी पर बड़ा हमला किया है। उन्होंने शिवानंद तिवारी को अवसरवादी नेता बताया है। तेजस्वी यादव पर तिवारी के जुबानी हमले के जवाब में सुनील कुमार ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए पलटवार किया है। उनके फेसबुक पोस्ट से बिहार की सियासत गरमा गई है।

लालू परिवार के बेहद करीबी सुनील कुमार सिंह तेजस्वी यादव के बचाव में शिवानंद तिवारी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। फेसबुक पर उन्होंने पोस्ट डाला है जिसमें कहा है कि तथाकथित अवसरवादी तिवारी बाबा को जब तक JDU या BJP कुछ बनाने का आश्वासन नहीं देगा,तब तक ये RJD के विरुद्ध रुदाली विलाप करते रहेंगे।

शिवानंद तिवारी आरजेडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे। लालू यादव की नई टीम बनी तो उन्हें कोई स्थान नहीं मिला। पार्टी की कमान तेजस्वी के हाथों में चली गई। 2025 के चुनाव में पार्टी की करारी हार मिली। समीक्षा बैठक में भी शिवानंद तिवारी को कुछ बोलने का मौका नहीं मिला तो उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया। तेजस्वी यादव के अनुभव और राजनैतिक कौशल पर उन्होंने दो फेसबुक पोस्ट डाला।

दो दिन पहले उन्होंने फेसबुक पोस्ट में तेजस्वी यादव को जोरदार तरीके से लपेटा।तेजस्वी यादव को संबोधित करते हुए कहा कि वह लालू यादव के बेटे हैं, उनके वारिस हैं, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल का कमान अब तेजस्वी के ही हाथ में है। पिछले चुनाव में तो घोषित हो गया था कि महागठबंधन के बहुमत में आने पर तेजस्वी यादव ही मुख्यमंत्री होंगे लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।जय और पराजय तो किसी भी क्षेत्र में सहज और सामान्य नियम है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि हम अपने जय या पराजय को किस रूप में लेते हैं। पराजित पक्ष के नेता की भूमिका विजयी पक्ष के नेता के मुक़ाबले ज़्यादा बड़ी हो जाती है। क्योंकि अपने सहयोगियों और समर्थकों के मनोबल को बनाए रखने की जवाबदेही उसको ही निभानी होती है। पराजय के बाद अगर वह मैदान छोड़ देता है तो वह स्वयं ही घोषित कर देता है कि वह भविष्य में मैदान में उतरने की काबिलीयत उसमें नहीं है।

शिवानंद तिवारी ने लालू यादव पर कहा कि 90 के हीरो 2010 में 22 सीट पर सिमट गए। विरोधी दल की मान्यता भी नहीं मिली। तुमने तो थोड़ा बेहतर किया है। विपक्ष के मान्यता प्राप्त नेता हो। लेकिन नतीजा के बाद तुम ग़ायब हो गए। तुम्हें तो अपने सहयोगियों के साथ बैठना था। पार्टी के निचले स्तर तक के साथियों के साथ बैठना था। उनको ढाढ़स देनी थी ताकि हार के बाद भी उनका मनोबल थोड़ा बहुत क़ायम रहे। लेकिन तुमने तो मैदान ही छोड़ दिया। तुम तो दो दिन भी नहीं टिक पाए। अपने सहयोगियों और समर्थकों का मन छोटा कर दिया।

Avinash Roy

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