नीतीश-लालू में कब-कब बनते और बिगड़ते रहे रिश्ते, बिहार चुनाव में दोनों के मिलने से क्यों ढह जाते हैं सारे समीकरण?

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बिहार की सियासत में भूचाल आ गया है. बिहार में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) का गठबंधन टूट गया है. सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि नीतीश कुमार (Nitish Kumar) एनडीए (NDA) से नाता तोड़कर अब फिर से अपने पुराने सहयोगी लालू यादव की पार्टी आरजेडी (RJD) और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाएंगे. माना जा रहा है कि सीएम नीतीश कुमार शाम को राज्यपाल फागू सिंह चौहान से मुलाकात करेंगे.

बिहार में 5 साल में दूसरी बार बीजेपी और जेडीयू के बीच गठबंधन टूटा है. इससे पहले साल 2013 में दोनों मतभेदों के चलते अलग हुए थे. हालांकि साल 2017 में दोनों फिर साथ आ गए थे. बीजेपी आलाकमान बिहार की राजनीतिक स्थिति पर नजर बनाये हुए है.

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बिहार में फिर से सियासी बदलाव

बिहार में गठबंधन टूटने के बाद अब सियासी बदलाव तय है. नीतीश कुमार को बिहार की सियासत का ‘चाणक्य’ कहा जाता है. वो साल 2005 के बाद से लगातार बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बरकरार हैं. बीच-बीच में उनके सियासी विचार और रूख बदलते भी रहे. साल 1994 में नीतीश कुमार ने अपने पुराने सहयोगी लालू यादव का साथ छोड़कर लोगों को काफी हैरान कर दिया था. जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन किया लेकिन 1995 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का ही सामना करना पड़ा.

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2013 में लालू यादव की पार्टी के साथ आए

बीजेपी और समता पार्टी के बीच दोस्ती करीब 17 सालों तक चली. 2003 में समता पार्टी बदलकर जेडीयू बन गई थी. 2013 तक बीजेपी और जेडीयू की दोस्ती कुछ उतार चढ़ाव के साथ बरकरार रही. 2013 में लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार के लिए आगे बढ़ाने पर नीतीश खफा हो गए और करीब 17 साल की दोस्ती टूट गई. लालू की पार्टी आरजेडी के सहयोग से सरकार बनाई. हालांकि 2014 लोकसभा चुनाव में पार्टी को मिली हार के बाद नीतीश ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और जीतन राम मांझी को सीएम की कुर्सी पर बैठाया.

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17 साल पुराना गठबंधन तोड़ लालू से हाथ मिलाया

साल 2013 में बीजेपी ने लोकसभा चुनाव 2014 के लिए जब नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया तो नीतीश कुमार को यह रास नहीं आया और उन्होंने बीजेपी से 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया. दरअसल, नरेंद्र मोदी से नीतीश कुमार के वैचारिक मतभेद पुराने रहे हैं. राजद के सहयोग से सरकार चला रहे नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और कुर्सी अपनी सरकार के मंत्री और दलित नेता जीतन राम मांझी को सौंप दी. वे खुद बिहार विधानसभा चुनाव 2015 की तैयारी में जुट गए.

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2015 में महागठबंधन को बड़ी जीत मिली

बिहार में 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा. इस चुनाव में महागठबंधन को भारी जीत हासिल हुई. नीतीश कुमार 2015 को 5वीं बार सीएम की कुर्सी पर फिर से बैठे और लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बने.

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2017 में आरजेडी से नाता तोड़ा

साल 2017 में महागठबंधन में दरार पड़ गई. बिहार के डिप्टी सीएम और लालू यादव के बेटे तेजस्वी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो उन पर इस्तीफे का दबाव बनने लगा, लेकिन आरजेडी ने तेजस्वी के इस्तीफा देने से इनकार किया. 26 जुलाई 2017 को नीतीश कुमार ने खुद ही इस्तीफा दे दिया और लालू यादव की पार्टी आरजेडी से नाता तोड़कर फिर से एनडीए के साथ दोस्ती कर ली. 27 जुलाई 2017 को वो फिर से सीएम की कुर्सी पर काबिज हो गए.

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करीब 2 साल बाद फिर से RJD से दोस्ती?

साल 2020 के बिहार विधान सभा चुनावों में बीजेपी और जेडीयू साथ मिलकर चुनाव लड़े, लेकिन इस बार बीजेपी की ज्यादा सीटें आईं. बीजेपी की अधिक सीटें होने के बावजूद नीतीश कुमार ही सीएम की कुर्सी पर बैठे. अब करीब दो साल बाद ही फिर दोनों पार्टियों के बीच कलह सामने आई हैं. इस बात की अटकलें तेज हैं कि नीतीश कुमार अपने पुराने साथी लालू यादव की पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाएंगे.

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लालू-नीतीश की दोस्ती से ढह जाते हैं सारे समीकरण?

बिहार में नीतीश कुमार का सियासी आधार वोट बैंक ओबीसी और महादलित रहे हैं. करीब 8 से 10 फीसदी वोट शेयर के साथ वे जिस खेमे में होते हैं, सरकार उसकी लगभग तय हो जाती है. लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी एमवाई (MY) समीकरण यानी मुस्लिम-यादव को साधती है. जेडीयू ,आरजेडी और कांग्रेस का एक साथ आने से बिहार में बीजेपी के सामाजिक समीकरण को धक्का पहुंचाता है. ऐसे में दोनों अगर मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो सारे समीकरण धाराशाई हो जाते हैं.

2015 के चुनाव में जेडीयू-आरजेडी और कांग्रेस महागठबंधन को भारी जीत हासिल हुई थी. साल 2020 के चुनाव में भी लालू यादव की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, हालांकि बहुमत से कुछ सीटें कम मिली थीं. लोजपा की वजह से नीतीश की पार्टी को 2020 के विधान सभा चुनाव में बड़ा नुकसान हुआ था.

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RJD और जेडीयू की दूरियां कैसे हुई कम?

अभी कुछ दिन पहले ही मतभेद भूलकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश (Nitish) कुमार दावत-ए-इफ्तार के मौके पर राबड़ी देवी (Rabri Devi) के आवास पर पहुंचे थे. तेजस्वी और राबड़ी देवी समेत कई दूसरे आरजेडी नेताओं (RJD Leaders) ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया था. उस वक्त भी बिहार में सियासी बदलाव की अटकलें लगने लगी थीं. जातिगत जनगणना के फैसले से आरजेडी और जेडीयू के बीच भी दूरियां कम हुईं है. माना जा रहा है कि बीजेपी की नीतियों से नाराजगी की वजह से नीतीश फिर से लालू यादव के बेटे तेजस्वी के करीब आए. अब दोनों पार्टी साथ मिलकर सरकार चलाने को तैयार नजर आ रहे हैं.

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