जब नीतीश कुमार 7 दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री, साल 2000 का विधानसभा चुनाव था खास

वर्ष 2000 का विधानसभा चुनाव बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार के प्रभावी हस्तक्षेप के लिए याद रखा जाएगा। वे इस दौरान भले ही सात दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने, लेकिन इस चुनाव के बाद से ही बिहार की सियासत नयी करवटें लेनी शुरू कर चुकी थी। त्रिशंकु सदन बनने के बाद सरकार बनाने को खूब जोड़ तोड़ हुई। इस बीच बिहार बंटवारे की आहट भी आने लगी थी और इसको लेकर भी राजनीति चरम पर थी।
चुनाव परिणाम के बाद एनडीए और राजद गठबंधन के बीच सरकार बनाने को लेकर जबरदस्त खींचतान हुई। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार भी बनी, लेकिन उन्होंने बहुमत साबित करने के पहले ही इस्तीफा दे दिया। इसके बाद लालू प्रसाद यादव की सरपरस्ती में राष्ट्रीय जनता दल ने सरकार बनायी और राबड़ी देवी को फिर से मुख्यमंत्री बनाया गया। वे पांच वर्षों तक शासन चलाती रही।

वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव का परिणाम बिहार में एनडीए के लिए सुखद संदेश लेकर आया। राज्य में 324 विधानसभा क्षेत्रों में से 199 क्षेत्र में एनडीए को बढ़त मिली। इसके बाद सूबे की राजनीति एकदम से गर्म हो गयी। अगले वर्ष ही विधानसभा चुनाव होने थे। लिहाजा, यह माना जाने लगा कि इस बार लालू प्रसाद की विदाई तय है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में अगली सरकार की अटकलें लगायी जाने लगी। लालू प्रसाद के चारा घोटाले में नाम आने के बाद कांग्रेस ने इस चुनाव में राजद से दूरी बना ली। उसने अकेले विधानसभा का चुनाव लड़ने का फैसला किया।
उधर, लोकसभा चुनाव के परिणाम से उत्साहित एनडीए पूरे जोश-खरोश से चुनाव में उतरा। पर, विधानसभा चुनाव के बाद परिणाम पूरी तरह प्रतिकूल आए। 12 वीं विधानसभा में राष्ट्रीय जनता दल फिर से सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरा। उसने 124 सीटें जीत ली। भारतीय जनता पार्टी ने दूसरे स्थान पर और मजबूती के साथ अपनी जगह पक्की की।

कांग्रेस ने अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन किया। उसे केवल 21 सीटें आई। सरकार बनाने के लिए जादुई अंक 163 से सभी पीछे थे। दोनों ओर से सरकार बनाने की कवायद शुरू हो गयी। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए के पास 151 विधायकों का समर्थन था। उधर, लालू प्रसाद के पास 159 विधायकों का समर्थन हो गया। फिर भी दोनों बहुमत से दूर थे।
ऐसे में नीतीश कुमार ने समता पार्टी के नेता के रूप में सरकार बनाने का दावा पेश किया। 3 मार्च 2000 को वे सीएम बन गए। इसके बाद जादुई आंकड़ा जुटाने की कसरत शुरू हुई। बताया जाता है कि कई विरोधी विधायक उन्हें समर्थन देने को तैयार भी थे, लेकिन राजद के एक बाहुबली नेता ने कई विधायकों को अपने नियंत्रण में रख लिया। इससे एनडीए के लिए समर्थन जुटाना मुश्किल हो गया। नीतीश कुमार ने तोड़-फोड़ से सरकार कायम रखने से इनकार कर दिया। मात्र सात दिनों के बाद ही 10 मार्च को इस्तीफा दे दिया।

नीतीश कुमार ने जोड़तोड़ से कर दिया था मना
नीतीश कुमार की सरकार गिरने के बाद लालू प्रसाद सक्रिय हुए और उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश किया। राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद की सरकार बन गयी। कुछ अन्य विधायकों के समर्थन से राजद गठबंधन ने अपनी बहुमत साबित भी कर दिया। इसके बाद राबड़ी देवी ने पांच सालों तक सरकार का नेतृत्व किया। उन्होंने चार साल 360 दिनों तक सत्ता की बागडोर संभाली। भाजपा के सुशील कुमार मोदी विपक्ष के नेता बने। वे वर्ष 2004 तक इस पद पर रहे।
इसके बाद बदली परिस्थिति में जदयू के बड़ी पार्टी बन जाने के कारण उपेन्द्र कुशवाहा को विपक्ष का नेता बनाया गया। वे 2005 तक की शेष अवधि के लिए विपक्ष के नेता रहे। जदयू के वरिष्ठ नेता वशिष्ठ नारायण सिंह कहते हैं कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार तो बन गयी, लेकिन बहुमत का जुगाड़ नहीं हो पाया। नीतीश जी विधायकों की खरीद-फरोख्त के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने जोड़-तोड़ से भी मना कर दिया। ऐसे में सरकार टिक नहीं पायी। नीतीश कुमार ने शक्ति प्रदर्शन करना भी उचित नहीं समझा और पद छोड़ दिया। उधर, राजद ने सरकार बनी ली।

समता पार्टी और जदयू का हुआ विलय
इसके पहले बदली परिस्थिति में समता पार्टी और शरद यादव के नेतृत्व वाले जनता दल यूनाईटेड का विलय हो गया। इसके बाद नये रूप में जनता दल यूनाईटेड का गठन हुआ। इसके बाद इस दल की राजनीतिक ताकत बिहार में काफी तेजी से बढ़ी। इसका विस्तार भी तेजी से हुआ। नीतीश कुमार का चेहरा लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगा था।
15 नवंबर 2000 को हो गया बंटवारा
लालू प्रसाद के बिहार का बंटवारा नहीं होने देने के ऐलान के बावजूद 15 नवंबर 2000 को बिहार और झारखंड का बंटवारा दो अलग-अलग राज्यों के रूप में हो गया। झारखंड के स्वतंत्र अस्तित्व में आने के बाद बिहार विधानसभा में सीटों की संख्या 243 रह गयी। विधानसभा की 81 सीटें झारखंड में चली गयी। झारखंड में भाजपा की सरकार बनी। बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री चुने गये। इधर, बिहार में लालू प्रसाद और ताकतवर बन गए। उनकी देखरेख में राबड़ी देवी सहयोगी दलों के साथ 2005 तक सरकार चलाती रहीं।

जिस झारखंड के लिए लालू प्रसाद तैयार नहीं थे, उसके लिए वे राजनीतिक मजबूरी में तैयार हो गए। उधर, झारखंड मुक्ति मोर्चा इसके लिए अड़ा हुआ था। उसे झारखंड में अपना बेहतर भविष्य नजर आ रहा था। शासन चलाने को लालू प्रसाद झारखंड मुक्ति मोर्चा की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहते थे। वे जानते थे कि यदि बंटवारा नहीं हुआ तो झामुमो उनके विरोध में जा सकता है। ऐसे में उनके लिए परेशानी खड़ी हो सकती है। लालू प्रसाद झारखंड में भाजपा और झामुमो दोनों से दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहते थे। दोनों के बीच अघोषित समझौता हो गया। अंत में सब इस बंटवारे के लिए तैयार हो गए।



