समस्तीपुर : बिहार की दुग्ध सहकारी संस्था कॉमफेड की करीब 15 वर्षों की एक परियोजना की निविदा में निर्धारित वित्तीय शर्तों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। करीब ₹1,432.12 करोड़ के अनुमानित वार्षिक मूल्य वाली इस परियोजना में बोली जमानत (ईएमडी) की राशि ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹28.64 करोड़ किए जाने को लेकर समस्तीपुर सिविल कोर्ट के अधिवक्ता संजीव सौरभ ने बिहार सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय के समक्ष शिकायत कर स्वतंत्र समीक्षा की मांग की है।
अधिवक्ता का कहना है कि इतनी बड़ी ईएमडी और अन्य वित्तीय पात्रताओं के कारण सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए निविदा में भाग लेना कठिन हो सकता है। उन्होंने कहा है कि उनका उद्देश्य किसी खास बोलीदाता के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि सार्वजनिक महत्व की परियोजना में पारदर्शी और व्यापक प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना है।
निविदा की शर्तों के अनुसार भाग लेने वाली संस्था के लिए ₹75 करोड़ की नेटवर्थ और ₹100 करोड़ का टर्नओवर निर्धारित होने की बात कही गई है। इसके अलावा 15 हजार मीट्रिक टन क्षमता, परियोजना में शत-प्रतिशत निवेश और जोखिम वहन करने जैसी शर्तें भी हैं। परफार्मेंस सिक्युरिटी की दर को 0.25 प्रतिशत से बढ़ाकर पांच प्रतिशत किए जाने का भी उल्लेख किया गया है।
अधिवक्ता ने निविदा तैयार करने से पहले किए गए बाजार अध्ययन, संभावित प्रतिस्पर्धियों के आकलन और एमएसएमई पर पड़ने वाले प्रभाव से जुड़े अभिलेख सार्वजनिक करने की मांग की है। उन्होंने यह भी पूछा है कि ₹1,432.12 करोड़ के अनुमानित वार्षिक मूल्य का निर्धारण कब और किस आधार पर किया गया तथा इसी आधार पर ₹28.64 करोड़ की बोली जमानत तय करने की प्रक्रिया क्या रही।
शिकायत में यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि परियोजना का मूल्य पहले से इतना अधिक आंका गया था तो प्रारंभिक निविदा में ईएमडी केवल ₹10 लाख क्यों रखी गई थी। वहीं, बाद में ईएमडी को बढ़ाकर ₹28.64 करोड़ करने के पीछे वस्तुनिष्ठ आधार और सक्षम स्तर की स्वीकृति की जानकारी मांगी गई है।
शिकायतकर्ता के अनुसार अलग-अलग वित्तीय और तकनीकी शर्तों को परियोजना की प्रकृति एवं जोखिम के आधार पर उचित ठहराया जा सकता है। लेकिन ऊंची नेटवर्थ, बड़ा टर्नओवर, भारी ईएमडी, पांच प्रतिशत परफार्मेंस सिक्युरिटी, न्यूनतम उत्पादन क्षमता और पूरे निवेश का दायित्व एक साथ होने पर छोटे एवं मध्यम उद्यमों की भागीदारी प्रभावित हो सकती है। उन्होंने संयुक्त भागीदारी और विशेष प्रयोजन संस्था (एसपीवी) से जुड़े प्रावधानों की भी समीक्षा की मांग की है। उनका कहना है कि यदि छोटे और मध्यम उद्यम अपनी तकनीकी एवं वित्तीय क्षमताओं को मिलाकर प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं तो ऐसे प्रावधानों का एमएसएमई भागीदारी के दृष्टिकोण से परीक्षण जरूरी है।
निविदा में खाद्य सुरक्षा, पोषण संबंधी मानकों और आवश्यक प्रमाणन को लेकर भी स्पष्टता मांगी गई है। शिकायत में यह जानने की मांग की गई है कि जहां भारतीय मानकों या अन्य वैधानिक प्रमाणन की आवश्यकता है, वहां उन्हें निविदा में किस आधार पर शामिल किया गया है। अधिवक्ता संजीव सौरभ ने किसी अधिकारी या संस्था पर भ्रष्टाचार अथवा दुर्भावना का आरोप नहीं लगाया है। उन्होंने परियोजना के मूल्यांकन, वित्तीय गणना, ईएमडी एवं परफार्मेंस सिक्युरिटी में बदलाव, पात्रता शर्तों, बाजार अध्ययन, प्रतिस्पर्धा के आकलन और एमएसएमई पर संभावित प्रभाव की स्वतंत्र जांच की मांग की है। अब निगाह कॉमफेड और सरकार की ओर है कि ₹28.64 करोड़ की ईएमडी तथा अन्य वित्तीय शर्तों के पीछे कौन-सी गणना और जोखिम समीक्षा की गई और क्या इन शर्तों को तय करते समय एमएसएमई की भागीदारी का भी आकलन किया गया था।
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