Samastipur

बढ़ता तापमान और अनियंत्रित बारिश बढ़ा रही किसानों की चिंता, पारंपरिक खेती की जगह वैज्ञानिक तरीका अपनाएं

समस्तीपुर : जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि खेत-खलिहानों की वर्तमान चुनौती बन चुका है। कभी मानसून देर से पहुंचता है, कभी लंबे समय तक बारिश नहीं होती और फिर कुछ घंटों या दिनों में इतनी बारिश हो जाती है कि खेत जलमग्न हो जाते हैं। खेती के लिए चुनौती केवल बारिश की कमी या अधिकता नहीं, बल्कि वर्षा के समय, वितरण और तीव्रता में हो रहा बदलाव है। ऐसे में किसानों को पारंपरिक खेती के साथ वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने की जरूरत है। ये जानकारी डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. संजय कुमार सिंह ने दी है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2026 जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का प्रत्यक्ष उदाहरण है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के आंकड़ों के अनुसार 1 जून से 10 सितंबर 2026 के बीच देश में 650.4 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य वर्षा 766.6 मिमी है। यानी करीब 15.2 प्रतिशत कमी रही। बिहार में भी 1 जून से 8 सितंबर तक बारिश सामान्य से करीब 27 प्रतिशत कम रही, लेकिन कई क्षेत्रों में बाढ़ और नदियों के बढ़े जलस्तर की स्थिति बनी।

यह बताता है कि जलवायु परिवर्तन का मतलब केवल कम बारिश नहीं, बल्कि कम बारिश वाले वर्ष में भी अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की घटनाएं हो सकती हैं। कृषि वैज्ञानिक ने बताया की तापमान में बढ़ोतरी कृषि के लिए दूसरी बड़ी चुनौती है। अधिक गर्मी से फसलों में वाष्पोत्सर्जन बढ़ता है, मिट्टी की नमी घटती है और फूल, फल व दाना बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। गेहूं में गर्मी बढ़ने से दाना भरने की अवधि कम हो सकती है। धान और मक्का में फूल आने के समय अधिक तापमान उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। आम, लीची, केला, पपीता और सब्जियों जैसी फसलों में भी सनबर्न, फल गिरने, आकार घटने और गुणवत्ता में कमी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

डॉ. सिंह ने कहा कि बदलता तापमान और नमी की स्थिति कीट एवं रोगों के फैलाव को भी प्रभावित कर रही है। गर्म सर्दियों में कई कीट अधिक समय तक सक्रिय रह सकते हैं, जबकि गर्म और नम मौसम फफूंद व जीवाणु रोगों के लिए अनुकूल हो सकता है। ऐसे में केवल रासायनिक दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय किसानों को मौसम आधारित रोग पूर्वानुमान, नियमित खेत निगरानी, प्रतिरोधी किस्म, जैव नियंत्रण और एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाना जरूरी होगा। उन्होंने बताया कि जलवायु संकट में पानी का वैज्ञानिक प्रबंधन सबसे अहम है। सूखे क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन, खेत तालाब, ड्रिप व स्प्रिंकलर सिंचाई और मल्चिंग को बढ़ावा देना होगा। वहीं बिहार जैसे बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में अतिरिक्त पानी की शीघ्र निकासी भी जरूरी है। मिट्टी में कंपोस्ट, हरी खाद और फसल अवशेषों के उचित उपयोग से जलधारण क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

Avinash Roy

Recent Posts

जख्मी मां के बयान पर प्राथमिकी, पिता की ह’त्या का आरोपी पुत्र भेजा गया जेल

समस्तीपुर : मुफ्फसिल थाना क्षेत्र के मोहनपुर वार्ड-39 में पिता की हत्या और मां को…

1 घंटा ago

मजिस्ट्रेट की निगरानी में खुली विद्यापतिधाम मंदिर की दान पेटी, मिले 2.47 लाख रुपये

समस्तीपुर/विद्यापतिनगर : सुप्रसिद्ध विद्यापतिधाम उगना महादेव मंदिर (बालेश्वर स्थान) में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित दान राशि…

2 घंटे ago

जानें किस ह’त्याकांड मामले में LJP(R) नेता सह सिने कारोबारी अंट्टू ईस्सर हुए गिरफ्तार, कमरे का ताला तोड़कर पुलिस ने पकड़ा

समस्तीपुर : लोजपा (रा) नेता सह सिने कारोबारी अंट्टू ईस्सर को एसटीएफ, डीआईयू एवं नगर…

10 घंटे ago

माता-पिता की आखों के सामने 8 साल की बच्ची ने तोड़ा दम, समस्तीपुर में स्कूल जाते वक्त ट्रक ने छीन लिया जिगर का टुकड़ा

समस्तीपुर : मुसरीघरारी थाना क्षेत्र के मुसरीघरारी-समस्तीपुर मुख्य मार्ग पर हरपुर एलौथ गांव के पास…

19 घंटे ago