Samastipur

59 वर्षों बाद समस्तीपुर को फिर मिला उपमुख्यमंत्री का प्रतिनिधित्व

समस्तीपुर : समस्तीपुर समाजवाद की धरती और भारत रत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर की जन्मभूमि समस्तीपुर ने एक बार फिर प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। 59 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद इस जिले से विजय कुमार चौधरी के रूप में दूसरा उपमुख्यमंत्री मिला है। यह उपलब्धि न केवल समस्तीपुर के लिए गौरव का विषय है, बल्कि इसे कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक विरासत की निरंतरता के रूप में भी देखा जा रहा है। कर्पूरी ठाकुर बिहार की राजनीति के ऐसे जननायक रहे, जिन्होंने सादगी, संघर्ष और सामाजिक न्याय की राजनीति को नई दिशा दी। वे 1967 में पहली बार उपमुख्यमंत्री बने और बाद में दो बार मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए अल्प समय में भी गहरी छाप छोड़ गए।

1952 से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले कर्पूरी ठाकुर ने कभी चुनाव नहीं हारा और दशकों तक विधानसभा में जनता की आवाज बने रहे। वे बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी थे, जिन्होंने सत्ता के केंद्र में सामाजिक बदलाव की सोच को स्थापित किया। आज जब समस्तीपुर से ही विजय कुमार चौधरी उपमुख्यमंत्री बने हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से कर्पूरी ठाकुर की यादों को ताजा करता है। हालांकि दोनों नेताओं की राजनीतिक पृष्ठभूमि और कार्यशैली अलग-अलग रही है, लेकिन दोनों की जड़ें इसी सामाजिक और राजनीतिक धरातल से जुड़ी हैं।

विजय कुमार चौधरी का राजनीतिक सफर भी दिलचस्प रहा है। उन्होंने 1980 के दशक में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की नौकरी छोड़कर कांग्रेस के साथ राजनीति में कदम रखा। कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने और विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता भी रहे। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में उन्होंने जनता दल (यूनाइटेड) का दामन थामा और पिछले दो दशकों से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विश्वसनीय सहयोगी बने हुए हैं। जदयू में उनकी भूमिका एक कुशल रणनीतिकार और संतुलनकारी नेता की रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जहां कर्पूरी ठाकुर ने सामाजिक न्याय की राजनीति को जनांदोलन का रूप दिया, वहीं विजय कुमार चौधरी वर्तमान दौर की गठबंधन राजनीति में संतुलन और स्थिरता के प्रतीक बनकर उभरे हैं। समस्तीपुर की यह राजनीतिक परंपरा दर्शाती है कि यह जिला सिर्फ नेताओं को जन्म नहीं देता, बल्कि समय-समय पर बिहार की राजनीति को दिशा देने का काम भी करता है। कर्पूरी ठाकुर से लेकर विजय चौधरी तक की यह यात्रा सामाजिक चेतना, राजनीतिक परिपक्वता और बदलते समय के साथ तालमेल की कहानी भी बयां करती है।

Avinash Roy

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