बिहार के सरकारी अस्पतालों में ओपीडी व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में स्वास्थ्य विभाग एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है. विभाग अब यह ट्रैक करेगा कि डॉक्टर मरीज को वास्तविक रूप से कितना समय दे रहे हैं. इसके लिए ओपीडी में इस्तेमाल होने वाले ऑनलाइन सॉफ्टवेयर में बदलाव की तैयारी की जा रही है, ताकि डॉक्टर के चैंबर में बिताए गए समय की अलग से रिकॉर्डिंग हो सके.
अब तक की व्यवस्था में मरीज के रजिस्ट्रेशन से लेकर दवा लेने तक का कुल समय दर्ज होता था. इससे यह साफ नहीं हो पाता था कि डॉक्टर और मरीज के बीच बातचीत में वास्तव में कितना वक्त लगा. नए बदलाव के बाद डॉक्टर के चैंबर में प्रवेश और बाहर निकलने का समय अलग से दर्ज होगा, जिससे परामर्श की वास्तविक अवधि सामने आएगी.
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार यह नई ट्रैकिंग प्रणाली केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगी. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों की ओपीडी तक इसे लागू किया जाएगा. इससे ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर मरीजों को मिलने वाली चिकित्सा सेवा की गुणवत्ता को परखा जा सकेगा.
विभागीय आंकड़ों के मुताबिक फिलहाल एक मरीज को ओपीडी में औसतन 38 मिनट लग रहे हैं. हालांकि इस समय में पर्ची कटवाना, इंतजार, जांच और दवा लेना सब शामिल है. नए सिस्टम के बाद यह साफ हो सकेगा कि इस पूरे समय में डॉक्टर ने मरीज को कितना समय दिया.
स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि इस बदलाव से डॉक्टरों पर अनावश्यक दबाव नहीं, बल्कि सिस्टम में संतुलन आएगा. मरीजों को पर्याप्त समय मिल रहा है या नहीं, इसका आकलन संभव होगा और जरूरत पड़ने पर सुधारात्मक कदम भी उठाए जा सकेंगे. सरकारी अस्पतालों में इलाज को केवल संख्या नहीं, गुणवत्ता से जोड़ने की यह पहल आने वाले दिनों में स्वास्थ्य व्यवस्था की दिशा तय कर सकती है.
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