पांच दशक से दो परिवारों के बीच घूम रही इस सीट की राजनीति, विरासत के तीसरी पीढ़ी तक पहुंचा शह-मात का खेल

दरभंगा जिले की इकलौती सुरक्षित सीट कुशेश्वरस्थान 2010 से पहले सिंघिया विधानसभा क्षेत्र कहलाती थी। यह रोसड़ा (अब समस्तीपुर) लोकसभा क्षेत्र में आती थी। इस क्षेत्र के नए परिसीमन की बात हो अथवा पुराने की, राजनीति का पहिया दो ही परिवारों पर टिका है। विगत 45 वर्षों से दोनों परिवारों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता जारी है। दोनों परिवार एक-दूसरे को पटखनी देने में लगे रहते हैं। यह विधानसभा चुनाव दोनों परिवारों के लिए चुनावी राजनीति का अनोखा प्रयोग बनने वाला है।

दरअसल, पहली बार दोनों परिवार एक दल जदयू में समा गए हैं। इसमें एक परिवार पूर्व मंत्री स्व. बालेश्वर राम का है तो दूसरा परिवार पूर्व सांसद रामजतन पासवान का। वर्तमान में दोनों परिवार से तीसरी पीढ़ी के मंत्री महेश्वर हजारी के पुत्र सन्नी हजारी व डॉ. अशोक कुमार के पुत्र अतिरेक राजनीति में सक्रिय हैं। अतिरेक को जदयू ने कुशेश्वरस्थान से एनडीए का उम्मीदवार बनाया है।

बता दें की पहले दोनों परिवारों का राजनीति क्षेत्र अलग-अलग था। मसलन, पूर्व मंत्री स्व. बालेश्वर राम का राजनीतिक क्षेत्र हायाघाट था तो स्व. रामजतन पासवान का सिंधिया। लेकिन, 1980 के लोकसभा चुनाव के बाद दोनों का राजनीतिक क्षेत्र सिंधिया विधानसभा क्षेत्र हो गया। वहीं से दोनों परिवारों का सियासी टकराव शुरू हुआ। रामजतन पासवान स्वयं तो चुनाव नहीं लड़े, लेकिन अपने भतीजे रामसेवक हजारी को जनता पार्टी के टिकट से मैदान में उतार दिया। मुकाबला हुआ कांग्रेस के उम्मीदवार बालेश्वर राम से। इसमें बालेश्वर राम की जीत हुई।

1985 के विधानसभा चुनाव में बालेश्वर राम ने अपने पुत्र डॉ. अशोक कुमार को कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतारा, दूसरी ओर कई बार के विधायक रहे रामजतन पासवान स्वयं भाकपा के टिकट पर लड़े, लेकिन सफलता नहीं मिली। 1990 के चुनाव में डॉ. अशोक कुमार फिर रामजतन पासवान पर भारी पड़े। 1995 के चुनाव में रामजतन की जगह उनके छोटे भतीजे शशिभूषण हजारी समता पार्टी के टिकट पर मैदान में आए, लेकिन डाॅ. अशोक कुमार से हार गए।

कुशेश्वरस्थान से डाॅ. अशोक कुमार के पुत्र अतिरेक को जदयू ने बनाया है उम्मीदवार

रामजतन पासवान के परिवार के जगदीश पासवान जदयू के टिकट पर 2000 के चुनाव में फिर डाॅ. अशोक कुमार से मात खा गए। 2005 के चुनाव में रामजतन पासवान के परिवार के सदस्य को जदयू से टिकट नहीं मिला। ऐसे में डॉ. अशोक कुमार फिर चुनाव जीत गए। लेकिन, 2010 में सिंधिया से कुशेश्वरस्थान नाम से गठित नए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र पर अब तक रामजतन पासवान के परिवार का कब्जा बरकरार है। 2010 में कांग्रेस के डाॅ. अशोक कुमार को हराकर भाजपा से शशिभूषण हजारी विधायक बने।

2015 के चुनाव में कांग्रेस और जदयू में गठबंधन रहने से डाॅ. अशोक कुमार चुनाव लड़ने से वंचित रह गए और शशिभूषण हजारी को महागठबंधन से जीत मिली। 2020 में डॉ. अशोक कुमार को एक बार फिर जदयू से शशिभूषण हजारी ने पटखनी दे दी। हालांकि, शशिभूषण हजारी के निधन पर 2021 के उप चुनाव में उनके पुत्र अमन भूषण हजारी ने डॉ. अशोक कुमार के पुत्र कांग्रेस प्रत्याशी अतिरेक कुमार को चौथे स्थान पर धकेल दिया था।

अमन भूषण हजारी

शह-मात का चलता रहा है खेल :

उधर, रोसड़ा लोकसभा क्षेत्र परिसीमन के कारण 2009 में समस्तीपुर के नाम से अस्तित्व में आया। रामजतन पासवान के पौत्र व रामसेवक हजारी के पुत्र महेश्वर हजारी ने जदयू के टिकट पर नवगठित क्षेत्र के पहले चुनाव में डॉ. अशोक कुमार को पटखनी दे दी और सांसद बन गये। लेकिन, 2014 के लोकसभा चुनाव में लोजपा के रामचंद्र पासवान ने महेश्वर हजारी और डाॅ. अशोक कुमार दोनों को पराजित कर दिया। रामचंद्र पासवान भी महेश्वर हजारी के ममेरे भाई लगते है। इधर 2019 के चुनाव और उप चुनाव में रामजतन पासवान का परिवार एनडीए गठबंधन के कारण चुनाव से बाहर रहा। दोनों चुनाव में डाॅ. अशोक कुमार को लोजपा से हार का सामना करना पड़ा।

सन्नी हजारी

इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में जदयू नेता और बिहार सरकार में मंत्री महेश्वर हजारी ने बड़ी चतुराई से अपने पुत्र सन्नी हजारी को कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव में उतार कर डाॅ. अशोक कुमार को मैदान से ही बाहर कर दिया। आज महेश्वर हजारी नीतीश केबिनेट में वरीय मंत्री हैं, जदयू में उनकी पूछ भी है। पार्टी ने कल्याणपुर विधानसभा क्षेत्र से उन्हें फिर से उम्मीदवार भी बनाया है। ऐसे में अपने पुत्र के साथ डॉ. अशोक कुमार के जदयू में चले जाने से दो परिवारों की पांच दशक पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता खत्म हो गयी है? इधर महेश्वर हजारी के पुत्र सन्नी हजारी भी भाजपा ज्वाइन कर एनडीए का ही हिस्सा हो गये हैं।

भाजपा ज्वाइन करने के बाद सन्नी हजारी :

Avinash Roy

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