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जब शिबू सोरेन ने कहा- हमें बस अलग झारखंड राज्य चाहिए

बात साल 2000 की है. बिहार तब अविभाजित था. झारखंड अलग राज्य निर्माण के लिए लड़ाई चल रही थी. झारखंड मुक्ति मोर्चा इसकी अगुआई कर रहा था. बिहार में राजद की सरकार थी और राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं. उसी साल के शुरू में बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ. 13 राजनीतिक पार्टियों ने बिहार विधानसभा की कुल 324 में से 304 सीटें जीती थीं. 20 सीटों पर निर्दलीय निर्वाचित हुए थे.

लालू प्रसाद की अगुआई वाली पार्टी राजद को सबसे अधिक 123 सीटें मिली थीं. सरकार बनाने के लिए 163 विधायकों का समर्थन चाहिए था. कांग्रेस, बसपा, माकपा और केएसपी के समर्थन के बाद भी राजद गठबंधन के विधायकों की संख्या 156 ही हो रही थी. सरकार बनाने के लिए और सात विधायकों का समर्थन चाहिए था.

दूसरी ओर भाजपा, समता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के राजग गठबंधन को 122 सीटें मिली थीं. उसे सरकार बनाने के लिए 41 और विधायकों का समर्थन चाहिए था. भाकपा, माले और मासस के 12 विधायक थे, मगर इन दलों ने दोनों गठबंधन से इतर तीसरे मोर्चे के निर्माण के लिए संघर्ष जारी रखने का एलान कर दिया था. एक निर्दलीय विधायक ने भी तटस्थ रहने का फैसला सुना दिया था.

उधर, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ की यात्रा बीच में छोड़ कर दिल्ली लौट गये थे और 27 फरवरी को उनके आवास पर राजग गठबंधन के नेताओं की तीन घंटे तक बैठक चली. नीतीश कुमार को राजग का नेता चुन लिया गया. तय हुआ कि अगले दिन 28 फरवरी को नीतीश कुमार दिल्ली से पटना पहुंचेंगे और राज्यपाल विनोद चंद्र पांडेय से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे.

सरकार बनाने के लिए 41 और विधायक कहां से आयेंगे, राजग में इसे लेकर माथापच्ची करने में लगा था. दूसरी ओर, 27 फरवरी की ही रात मुख्यमंत्री आवास, पटना में राजद गठबंधन ने राबड़ी देवी को विधायक दल का नेता चुन लिया और उसने भी अगले ही दिन, 28 फरवरी को राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करने का फैसला कर लिया, मगर सरकार बनाने के लिए बहुमत का आंकड़ा न तो राजग के पास था, न राजद के पास.

ऐसे में राजद और राजग, दोनों की नजर बाकी निर्दलीय और झामुमो विधायकों पर थी. उस चुनाव में झामुमो के 12 उम्मीदवार जीते थे. पार्टी के अध्यक्ष शिबू सोरेन किंग मेकर की भूमिका में थे. सब की नजर उन पर थी. इधर, शिबू सोरेन अचानक पटना से निकल पर 27 फरवरी की रात दुमका पहुंच गये.

गुरुजी यानी शिबू सोरेन ने तब पहली बार बिहार का मुख्यमंत्री बनने की इच्छा व्यक्त की थी. कहा, जो ‘मंझिया’ (खुद के विषय में) को मुख्यमंत्री बनायेगा, उसी को समर्थन देंगे. उनका यह बयान बिल्कुल अप्रत्याशित था. उनसे इस पर लंबी बातचीत हुई. प्रदेश के सियासी हालात को लेकर उस रात गुरुजी बेहद सख्त थे.

उन्होंने कहा- सीएम कुर्सी के अलावा कोई भी मुद्दा मेरे लिए मतलब नहीं रखता है. हमें न तो ‘जैक’ (झारखंड एरिया ऑटोनॉमस काउंसिल) चाहिए, न ही सड़क, हमें बस अलग राज्य चाहिए और जब तक अलग राज्य नहीं बनता है, तब तक के लिए मुझे मुख्यमंत्री (बिहार के मुख्यमंत्री) की कुर्सी मिलनी चाहिए.

बिहार विधानसभा की 12 सीटों पर सफलता और त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में झामुमो की अत्यधिक राजनीतिक भूमिका के कारण गुरुजी काफी आत्मविश्वास में नजर आ रहे थे. उन्होंने बार-बार यही दोहराया, ‘दूध का जला मट्ठा फूंक-फूंक कर पीता है. हमें सभी दलों ने लगातार छला है. हमारे साथ हर बार विश्वासघात किया गया. अब हमें किसी पर भरोसा नहीं रहा. अब अगर कोई दूसरा आदमी मुख्यमंत्री बनता है, तो अलग राज्य की प्रक्रिया लटका दी जायेगी. इसलिए हम खुद ही मुख्यमंत्री बनकर अलग राज्य की प्रक्रिया को आसान बनाना चाहते हैं.’

उन्होंने कहा, ‘सब हमको मांझी (आदिवासी) समझ कर ठगना चाहते हैं. हम और ठगे जाने के लिए तैयार नहीं हैं. सभी जाति के लोग मुख्यमंत्री की कुर्सी पा चुके हैं, तो फिर एक आदिवासी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर क्यों नहीं बैठ सकता? हम बिहार को 70 प्रतिशत रॉयल्टी देते हैं. लालू प्रसाद बताएं कि वह कितनी रॉयल्टी देते हैं? जब 30 प्रतिशत रॉयल्टी देकर दूसरे लोग और लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बन सकते हैं, तो 70 फीसदी रॉयल्टी देने वाले को क्यों मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा सकता?’

अगर राजग हमारा प्रस्ताव मान ले, तो उसे भी समर्थन देने में हमें कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि झारखंड में सांप्रदायिकता कोई मुद्दा नहीं है. भाजपा वाले भी आदमी हैं और हम किसी को अछूत नहीं मानते हैं.’ दुमका गुरुजी की राजनीतिक कर्मभूमि थी और यहां से उनका गहरा लगाव रहा. वे जब भी दुमका आते, एक राजनीतिक उत्सव का माहौल होता. उनके निधन से दुमका आज उदास है.

Avinash Roy

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