बिहार में इस बार होली का त्योहार राजनीतिक रंग से सराबोर होता दिख रहा है। राज्यसभा चुनाव के लिए जोड़-तोड़ चरम पर पहुंच गई है। एनडीए के घटक दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के नेता उपेंद्र कुशवाहा का राज्यसभा सांसद का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और उनके सामने अब अपने भविष्य का सवाल है। बिहार में सिर्फ 4 विधायकों वाली उनकी पार्टी में बगावत की आग पहले से ही उनकी परेशानी का कारण बनी हुई है। खबर है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने उनके सामने एक ऐसा प्रस्ताव रख दिया है जो उनकी राज्यसभा में जाने की राह तो खोल देगा, लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी पार्टी को बलिदान करना पड़ेगा। बीजेपी ने उनसे आरएलएम का बीजेपी में विलय करने का ऑफर दिया है।
बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए चुनाव होना है। इसमें से दो सीटें बीजेपी और दो सीटें जनता दल यूनाईटेड (जेडीयू) को मिलना तय है। पांचवी सीट को लेकर अब तक स्थिति साफ नहीं है। हालांकि अब तक किसी भी पार्टी ने अपने किसी भी उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं किया है। इस चुनाव में नामांकन के लिए अंतिम तारीख 5 मार्च है। इससे पहले 4 मार्च को होली का अवकाश है। ऐसे में संभव यही है कि अंतिम तारीख, यानी 5 मार्च को ही उम्मीदवारों के नाम सामने आएंगे। पांचवी सीट के लिए एनडीए और विपक्ष के महागठबंधन का नेतृत्व कर रहे राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के बीच खींचतान जारी है।
अचानक बीजेपी ने क्यों दिया उपेंद्र कुशवाहा को ऑफर?
सवाल यह है कि अचानक बीजेपी ने उपेंद्र कुशवाहा को यह प्रस्ताव क्यों दिया? इसके पीछे बीजेपी की राज्यसभा के लिए चुनावी रणनीति है। यदि उपेंद्र कुशवाहा यह ऑफर स्वीकार कर लेते हैं तो उनको बीजेपी राज्यसभा में भेजकर एनडीए का संख्या बल बढ़ा ही लेगी, साथ ही आरएलएम के विलय के साथ बिहार में बीजेपी के विधायकों की संख्या भी 89 से बढ़कर 93 हो जाएगी। इतना ही नहीं, आरएलएम के विलय के बहाने बीजेपी की उस पिछड़े वर्ग के वोट बैंक पर भी है जो कि कुशवाहा और उनकी पार्टी का बड़ा जनाधार है। सवाल यह है कि ऐसा करके बीजेपी कुशवाहा को मदद कर रही है या एनडीए के एक घटक दल को समाप्त कर रही है?
ठीक 3 साल पहले कुशवाहा ने छोड़ी थी जेडीयू
बीजेपी इस रणनीति में तभी कामयाब हो सकती है जब उपेंद्र कुशवाहा राजनीतिक अवसर को सामने रखकर पिछली बातें भूल जाएं। कुशवाहा ने अब से ठीक तीन साल पहले 20 फरवरी 2023 को जेडीयू छोड़ी थी। उस समय उन्होंने साफ कहा था कि वे गठबंधन कर सकते हैं, लेकिन बीजेपी में कभी नहीं जाएंगे। अब यदि वे बीजेपी का प्रस्ताव मान लेते हैं तो यह अपनी बात से मुकरना होगा। ऐसे में विपक्ष को भी उन पर उंगली उठाने का मौका मिल जाएगा। हालांकि राजनीति में दोस्ती-दुश्मनी जैसी कोई चीज नहीं होती, अवसर मिलने पर दोस्त के दुश्मन, या दुश्मन के दोस्त बनने में देर नहीं लगती।
राज्यसभा की पांच सीटों में से चार को लेकर तो कोई संशय नहीं है, पांचवी सीट की स्थिति स्पष्ट नहीं है। संभावना यही बन रही है कि इस सीट के लिए एनडीए के अलावा आरजेडी भी अपना उम्मीदवार उतारेगी। यानी 5 सीटों के लिए 6 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हो सकते हैं।
पांचवी सीट के लिए जुगत लगा रहे लालू यादव
पांचवी सीट के लिए न तो एनडीए के पास, न ही महागठबंधन के पास पर्याप्त संख्या बल है। इस सीट को जीतने के लिए कम से कम 41 विधायकों की जरूरत है जबकि महागठबंधन के पास सिर्फ 35 विधायक हैं। आरजेडी प्रमुख लालू यादव 6 एमएलए का समर्थन हासिल करने की जुगत लगा रहे हैं। उनकी नजर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के पांच विधायकों और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के एक विधायक पर है। यदि ओवैसी के साथ मायावती को भी मनाने में वे कामयाब हो जाते हैं तो पांचवी सीट आरजेडी को मिल सकती है।
एनडीए के सामने 3 विधायकों को तोड़ने की चुनौती
एनडीए बिहार की पांचों राज्यसभा सीटों के लिए जोर लगा रहा है। यदि वह तीन और विधायकों को तोड़ने में कामयाब होता है तो वह पांचवी सीट भी जीतने में कामयाब हो सकता है। बताया जाता है कि एनडीए महागठबंधन के घटक दल इंडियन इन्क्लुसिव पार्टी (आईआईपी) के एक मात्र एमएमए आईपी गुप्ता पर नजर गड़ाए है। इसके अलावा उसकी नजर कांग्रेस के उन तीन विधायकों पर भी है जो पार्टी से बगावत पर उतारू हैं। इसके अलावा वह बीएसपी के एक एमएलए का भी समर्थन हासिल करने की फिराक में है। चूंकि महागठबंधन के दलों की एकता पर चुनाव के पहले और बाद में भी सवाल उठते रहे हैं इसलिए एनडीए अपने उद्देश्य में कामयाब भी हो सकता है। यदि वह इस रणनीति में सफल हुआ तो वह सहयोगी दल एलजेपी-आर के नेता चिराग पासवान की मां रीना पासवान को राज्यसभा में भेज सकता है।
फिलहाल आरएलएम के बीजेपी में विलय को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। नामांकन दाखिले में तीन दिन शेष हैं और इसी बीच रंगों का उत्सव है। बिहार में होली के रंगों के साथ-साथ राजनीति के भी कई रंग देखने को मिल सकते हैं।
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