बिहार: जिनके देशभक्ति के गाने से कांपते थे अंग्रेज, 102 साल के “जंग बहादुर सिंह” जी रहे गुमनामी की जिंदगी

स्वतंत्रता के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्‍य में भारत आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। इसके तहत हम देश की आजादी में योगदान देने वाले लोगों को याद कर रहे हैं। ऐसे ही आजादी के सिपाही हैं बिहार के सिवान के रहने वाले 102 साल के भोजपुरी लोक-गायक जंग बहादुर सिंह, जिन्‍होंने गुलामी से आजाद भारत में आज तक का दौर देखा है। गुलामी के दौर में अपने जोश भर देने वाले गीतों के माध्‍यम से उन्‍होंने युवाओं को देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने को प्रेरित किया। इसके लिए उन्‍हें कारागार की यातनाएं सहनी पड़ीं।

क्रांतिकारियों के बीच गाते थे भोजपुरी देशभक्ति-गीत

जब महात्‍मा गांधी का भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था, 22 साल के जंग बहादुर जगह-जगह क्रांतिकारियों के बीच जाकर भोजपुरी में देशभक्ति-गीत गाते थे। वे छुप-छुपकर आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने लगे थे। युवा जंग बहादुर देशभक्तों में जोश जगाने के कारण अंग्रेजी हुकूमत की आंखों की किरकिरी बन गए थे। साल 1942 से 1947 तक आजादी के तराने गाने के लिए वे ब्रिटिश प्रताड़ना के शिकार हुए, जेल की यातनाएं भी सहीं। पर हार नहीं मानी।

अपने देशभक्ति व धार्मिक गीतों से बनाई पहचान

साल 1947 के 15 अगस्‍त को भारत आजाद हुआ। जंग बहादुर अब लोक-धुन पर देशभक्ति गीतों के लिए जाने गए। साठ के दशक में जंग बहादुर का सितारा बुलंदी पर था। वे भोजपुरी देशभक्ति गीतों के पर्याय बन चुके थे। इसके अलावा भैरवी, रामायण और महाभारत के पात्रों की गाथाएं गाने में भी जंग बहादुर ने पहचान बनाई।

कोसों दूर तक सुनी जाती थी उनकी बुलंद आवाज

आजीविका के लिए पश्चिम बंगाल के आसनसोल में सेनरेले साइकिल करखाने में नौकरी करने लगे। इस दौरान भोजपुरी की व्यास शैली में गायन कर झरिया, धनबाद,  दुर्गापुर, संबलपुर, रांची आदि क्षेत्रों में पहचान बनाई। जंग बहादुर के गायन की विशेषता यह रही कि उनकी बुलंद आवाज बिना माइक के ही कोसों दूर तक सुनी जाती थी। आधी रात के बाद उनके सामने कोई टिकता नहीं था।

102 वर्ष की आयु में गुमनामी के अंधेरे में जीवन

करीब दो दशक तक अपने भोजपुरी गायन से बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर-प्रदेश आदि राज्यों में बिहार का नाम रोशन करने-वाले जंगबहादुर सिंह प्रचार-प्रसार से कोसों  दूर रहे। कालक्रम में भोजपुरिया समाज भूलता चला गया। आज 102 वर्ष की आयु में वे गुमनामी के अंधेरे में जीने को विवश हैं।

Avinash Roy

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