रिपोर्टर विश्लेषण : विपक्षी दलों के खामोशी को CM नीतीश ने तोड़ा, बिहार में आगे BJP की राह आसान नहीं

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[मंटून कुमार] : जिस दौर में सारा विपक्ष भाजपा की सत्ता के सामने नतमस्तक हो उसी वक्त नीतीश कुमार ने मोदी सरकार को झटका दे दिया। विपक्ष की खामोशी और विपक्ष के भीतर का खौफ क्या नीतीश कुमार भर पाएंगे यह तो आगे देखने वाली बात है। बहरहाल जैसे ही नीतीश कुमार ने राज्यपाल को इस्तीफा सौंपते हुए अपना समर्थन पत्र सौंपा वैसे ही उन्होंने बीजेपी से पल्ला यह कहते हुए झाड़ लिया की सभी नेता चाहते थे कि हमें एनडीए से अलग हो जाना चाहिए।

दूसरी तरफ महागठबंधन के साथ सत्ता में आने का ऐलान कर दिया और तेजस्वी के साथ राबड़ी आवास में एक बैठक भी कर लिया। इस दौरान सभी ने सर्वसम्मति से नीतीश कुमार को विधायक दल का नेता भी चुन लिया। इसके बाद बुधवार को नीतीश ने मुख्यमंत्री और तेजस्वी ने उपमुख्यमंत्री का शपथ लिया।

वहीं अगर बीजेपी की बात की जाए तो यह राजनीतिक तौर पर उसकी सबसे बड़ी हार साबित हो सकती है जिसकी शुरुआत बिहार से हुई। मजबूत विपक्ष के रूप में बिहार केंद्र की ओर खड़ा है क्योंकि 2024 का लोकसभा चुनाव का रणनीति बीजेपी ने अभी से ही शुरू कर दिया है। जिसमें विपक्ष का हैसियत कहीं दिख नहीं रहा है।

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राजनीति हिसाब से आप पूरे राज्यों का लिस्ट उठाकर देख लीजिए जहां पूरा विपक्ष आपको मोदी सत्ता के सामने नतमस्तक दिखाई देता है। जिसमें तमाम संविधानिक एजेंसियों का खौफ दिखाया जा रहा है। चाहे ईडी का हो या सीबीआई का। वहीं किसी पार्टी को यह भी भरोसा नही है कि उसका विधायक कल कितने में बिक जाए। किसी पार्टी को यह भी नही पता होगा कि जिसको जनता ने जिताकर भेजा है उसकी भी सत्ता 5 साल चल पाएगा कि नही। मतलब साफ है कि दिल्ली में बैठे आका कोई खेल न कर दें।

सच कहिए तो भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता पाने की ऐसी हनक कभी नही देखी गई थी। विपक्ष के तौर पर संसद में ऐसी स्तिति उत्पन्न कर दिया जाए कि विपक्ष का कोई नेता न हो। यहां सत्ता इस तरह संवेधानिक पद का दुरउपयोग कर रहा हो चाहे वो कैग हो, या योजना आयोग। अब तो नीति आयोग ने गरीबी व भुखमरी जैसा रिपोर्ट देना ही बन्द कर दिया है।

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लेकिन मौजूदा वक्त में बिहार में ऐसी परिस्तिथि ने जन्म ले लिया हैं जो 2024 कि बढ़ते दिशा में एक नए विकल्प को खड़ा कर पाएगी या कहे जो विपक्ष की खामोशी था वो नीतीश कुमार ने तोड़ दिया है। अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप कर यह कहा कि जिसके गठबन्धन से जो सरकार चल रही थी उसके साथ हम सरकार चलाने में सक्षम नही हैं। तुरन्त ही दूसरा लिफाफा नीतीश कुमार ने थमा दिया यह कहते हुए की हमारा यह समर्थन पत्र भी है जो राजद, कांग्रेस और वामदलों के सहयोग है। दूसरी सरकार का दावा पेश कर रहा हूँ ।

लेकिन महागठबंधन के अंदर नीतीश कुमार की चमक इस दौर में जो दिख रहा है जहां ईडी का खौफ पूरे देश के विपक्ष को है और उस ईडी पर सुप्रीम कोर्ट का मोहर भी लग चुका है वो किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है।कब किसकी गिरफ्तारी हो जाए कुछ कहना मुश्किल है। चाहे वह शक्स सोनिया गांधी हो या राहुल गांधी।

दूसरी ओर ममता बनर्जी पर भी बीजेपी अपना नकेल कस चुकी है। उसके दूसरे नम्बर के नेता अभिषेक बनर्जी भी न गिरफ्तार हो जाए। यह वही बिहार है जहां जय प्रकाश नारायण ने कांग्रेस से निकलकर इंदिरा गांधी के खिलाफ विगुल फूंका था। यह वही नीतीश कुमार है व लालू यादव है जो उस समय राजनीतिक पटल पर अपना कदम रखने में सफल रहें थे। खैर सवाल यह है कि 2024 में विपक्ष के रूप मे कौन से नेता मजबूती के साथ बीजेपी के साथ खड़े होंगे।

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विकास की अगर बात की जाए तो डबल इंजन की सरकार में भी कुछ विकास जनता को नही मिल पाया। चाहे वह विशेष राज्य के दर्जे की बात हो या पटना यूनिवर्सिटी को केंद्रीय दर्जे की बात। जिस तरह से मायावती को उत्तर प्रदेश में बीजेपी खत्म कर सत्ता में पहुँची, ठीक उसी तर्ज पर बिहार में आरसीपी के जरिए बीजेपी जदयू को खत्म कर अपनी विसात फैलाने की कोशिश में लगा था। उसकी भनक नीतीश कुमार को विधानसभा चुनाव के बाद ही पता चल गया था और नीतीश कुमार उसी समय से बीजेपी से अलग होने का वक्त तलाशते नजर आ रहें थे।

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लेकिन 31 जुलाई को जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा बिहार में पार्टी के कार्यालयों का उद्घाटन करने पहुंचे थे, इस दौरान उनके भाषण के उस अंश ने नीतीश कुमार को अलग होने के लिए बाध्य कर दिया जिसमें जेपी नड्डा ने कहा था की हम किसी भी क्षेत्रिय पार्टी को खड़े होने नहीं देगें। इसके बाद तुरंत नौ दिनों के भीतर ही सबकुछ बदल गया। नीतीश कुमार ने परिस्थितियों को भांप लिया कि कहीं बीजेपी साथ रहकर भी भीतर-भीतर जेडीयू को दफन न कर दें।

यह वही बिहार है जहां सबसे अधिक अग्निपथ योजना का विरोध शुरू हुआ और उसको सरकार ने कैसे दबाया यह जनता को भली-भांति मालूम है। जनता को यह भी मालूम है कि हिटलर भी चुनाव जीतकर ही जर्मनी को तंगी की हालत में ला कर खड़ा कर सुसाइड कर लिया था। नीतीश कुमार जिस रास्ते पर निकलें हैं वो बिहार में सिर्फ सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है वो सीधे तौर पर मोदी सत्ता के सामने चुनौती के लिए खड़े हो गए हैं।

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