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पूसा कृषि विश्वविद्यालय की सलाह: वैज्ञानिक ढंग से धान की खेती कर कम लागत में पाएं अधिक उत्पादन

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समस्तीपुर : धान की खेती मुख्य रूप से मानसून की खेती है। देश के कई राज्यों के किसान खेतों में सिंचाई की सही व्यवस्था कर सीजन में दो बार धान की खेती कर रहे हैं। इससे बेहतर उत्पादन मिल रहा है। बिहार के किसान भी वैज्ञानिक तकनीक से धान की खेती कर बेहतर उत्पादन ले सकते हैं। आमदनी भी बढ़ा सकते हैं। यह जानकारी डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के अधीनस्थ कृषि विज्ञान केंद्र बिरौली की फसल विशेषज्ञ भारती उपाध्याय ने दी।

उन्होंने कहा कि धान उष्ण और उपोष्ण जलवायु की फसल है। पैदावार के लिए अधिक तापमान, अधिक आर्द्रता, अधिक वर्षा अच्छी मानी जाती है। उचित जल निकास वाली भारी दोमट मिट्टी धान के लिए उपयुक्त है। उन्होंने कहा कि जिन किसानों की धान की नर्सरी तैयार है, वे वैज्ञानिक तकनीक से रोपाई अविलंब करें। जिन किसानों ने नर्सरी नहीं लगाई है, वे बिचड़ा खरीदकर रोपाई कर सकते हैं। नर्सरी तैयार करने का मुख्य समय 12 मई से 31 मई तक होता है। यह समय अब समाप्त हो चुका है। भारती उपाध्याय ने कहा कि धान की फसल में उर्वरक की सही मात्रा का प्रयोग जरूरी है। उर्वरकों का उचित उपयोग अच्छी पैदावार देता है।

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धान के खेतों में खरपतवार का प्रबंधन करना भी बेहद जरूरी कृषि वैज्ञानिक ने कहा कि धान के खेतों में खरपतवार का प्रबंधन करना अत्यंत जरूरी होता है। किसान धान की रोपाई से कम से कम 40 दिनों बाद तक खेत को खरपतवारों से मुक्त रखें। किसान यांत्रिक विधि से निकाई-गुड़ाई का काम कर सकते है जो सबसे उत्तम है। कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि धान की सीधी बुआई तकनीक भी किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी तकनीक हैं। इस तकनीक से धान की बुआई कर किसान कम लागत और कम समय में अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इस तकनीक में धान के बिचरो को तैयार करने की जरूरत नहीं पड़ती है। बिचरो से रोपाई किए जाने वाले विधि की तुलना में सीधी बुआई की तकनीक में श्रम, इंधन और पानी सभी की बचत होती है।

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