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मिथिला पेंटिंग से नई पहचान बना रहे समस्तीपुर मंडल कारा के बंदी, ‘मुक्ति ब्रांड’ से बाजार तक पहुंच रही कैदियों की कला

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समस्तीपुर : जेल की ऊंची-ऊंची दीवारें अक्सर अपराध, सजा और बेबसी की कहानियां समेटे रहती हैं। लेकिन समस्तीपुर मंडल कारा की फिजा इन दिनों कुछ अलग है। यहां बैरकों के भीतर अब सिर्फ ताले और सलाखों की खनक ही नहीं सुनाई देती, बल्कि रंगों की खामोश भाषा भी बोलती है। जिन हाथों ने कभी कानून तोड़ा था, वही हाथ अब ब्रश थामकर सफेद कैनवास पर मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर रहे हैं। हर रंग, हर रेखा और हर आकृति मानो यह संदेश दे रही है कि यदि अवसर मिले तो इंसान अपने अतीत से आगे बढ़कर नई पहचान बना सकता है।

समस्तीपुर मंडल कारा में इन दिनों करीब दो दर्जन कैदी मिथिला पेंटिंग बनाने में जुटे हैं। जेल प्रशासन की पहल पर उन्हें न केवल प्रशिक्षण दिया गया, बल्कि पेंटिंग के लिए आवश्यक कैनवास, ब्रश और रंग भी उपलब्ध कराए गए। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद कैदियों ने अपनी कल्पना और मेहनत से ऐसी आकर्षक पेंटिंग तैयार की हैं, जो अब जेल की चहारदीवारी तक सीमित नहीं रहीं। इन्हें मुक्ति ब्रांड के तहत पटना के खादी मॉल में बिक्री के लिए भेजा जा रहा है। यह पहल केवल एक कला प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास की ऐसी सोच है, जो कैदियों के जीवन को नई दिशा देने का प्रयास कर रही है। जेल प्रशासन का मानना है कि यदि कैदियों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुरूप हुनर दिया जाए तो वे सजा पूरी होने के बाद सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं।

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सलाखों के बीच खिल रहे मिथिला के रंग :

मिथिला पेंटिंग मिथिलांचल की सांस्कृतिक पहचान मानी जाती है। पारंपरिक रूप से महिलाओं द्वारा दीवारों और कागज पर बनाई जाने वाली यह कला आज देश-विदेश में अपनी अलग पहचान बना चुकी है। समस्तीपुर मंडल कारा में भी यही कला अब कैदियों के जीवन का हिस्सा बन गई है। सुबह की गिनती और नियमित कार्यों के बाद निर्धारित समय पर कैदी कैनवास और ब्रश लेकर बैठ जाते हैं। कोई भगवान राम-सीता का चित्र बना रहा है, तो कोई राधा-कृष्ण की झांकी उकेर रहा है। कहीं मछली, हाथी, मोर और पेड़-पौधों की पारंपरिक आकृतियां आकार ले रही हैं, तो कहीं प्रकृति और लोकजीवन के रंग कैनवास पर उतर रहे हैं। इन चित्रों में केवल रंग नहीं, बल्कि कैदियों की भावनाएं, पश्चाताप और नई शुरुआत की उम्मीद भी दिखाई देती है। जेल के भीतर तैयार हो रही हर पेंटिंग उनके बदलते व्यक्तित्व की गवाही देती है। इसके लिए जेल प्रशासन हर रोज 290 रूपये दिहाड़ी भी देती है।

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मुक्ति ब्रांड से बाजार तक पहुंच रही कला :

जेल प्रशासन की ओर से अब तक करीब तीन दर्जन से अधिक छोटी-बड़ी मिथिला पेंटिंग तैयार कराई जा चुकी हैं। इनमें से लगभग आधा दर्जन पेंटिंग की फ्रेमिंग कराकर बेउर जेल के माध्यम से मुक्ति ब्रांड के तहत पटना स्थित खादी मॉल में बिक्री के लिए भेजी गई हैं। इन पेंटिंग की कीमत उनके आकार और डिजाइन के अनुसार 500 रुपये से लेकर 2000 रुपये तक निर्धारित की गई है। यदि लोगों का अच्छा प्रतिसाद मिलता है तो भविष्य में इनकी संख्या और बढ़ाई जाएगी। इससे कैदियों की कला को पहचान मिलने के साथ-साथ उन्हें आर्थिक लाभ भी मिलेगा।

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सिर्फ उत्पाद नहीं, बदलती सोच की तस्वीर :

समस्तीपुर मंडल कारा की यह पहल केवल पेंटिंग बेचने तक सीमित नहीं है। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य कैदियों के भीतर आत्मविश्वास पैदा करना और उन्हें यह एहसास कराना है कि जीवन में सुधार की राह हमेशा खुली रहती है। अक्सर देखा जाता है कि सजा पूरी होने के बाद जेल से बाहर आने वाले लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाता है। समाज भी उन्हें आसानी से स्वीकार नहीं करता। ऐसे में यदि उनके पास कोई हुनर हो तो वे अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं। इसी सोच के साथ जेल प्रशासन कैदियों को विभिन्न प्रकार के कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध करा रहा है।

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इलेक्ट्रिशियन बनने की भी मिल रही ट्रेनिंग :

मिथिला पेंटिंग के साथ-साथ मंडल कारा में बंद कैदियों को अन्य व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। वर्तमान में 90 दिनों का इलेक्ट्रिशियन प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। इस प्रशिक्षण के दौरान कैदियों को घरों की बिजली वायरिंग करना, पंखा, कूलर, एसी, फ्रिज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मरम्मत का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्हें ऐसा कौशल मिलेगा, जिससे वे जेल से बाहर निकलने के बाद रोजगार या स्वरोजगार शुरू कर सकें।

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जेल सुधार की नई सोच :

पिछले कुछ वर्षों में देशभर की जेलों में सुधारात्मक गतिविधियों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। कहीं कैदियों को खेती सिखाई जा रही है, तो कहीं सिलाई-कढ़ाई, बढ़ईगिरी, बेकरी, अगरबत्ती निर्माण और हस्तशिल्प का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। समस्तीपुर मंडल कारा ने इसी कड़ी में मिथिला पेंटिंग को अपनाकर एक नई मिसाल पेश की है। जेल अधीक्षक प्रशांत कुमार ओझा का मानना है कि कला व्यक्ति के भीतर सकारात्मक सोच विकसित करती है। चित्रकारी एकाग्रता बढ़ाती है, तनाव कम करती है और मन को शांत करती है। यही कारण है कि जेल प्रशासन इसे सुधारात्मक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रहा है।

कारा अधीक्षक ने बताया कि मंडल कारा में बंद कैदियों को पहले मिथिला पेंटिंग का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद कैदियों ने अब तक तीन दर्जन से अधिक अलग-अलग प्रकार की पेंटिंग तैयार की हैं। इन पेंटिंग को मुक्ति ब्रांड के तहत पटना के खादी मॉल में बिक्री के लिए भेजा गया है। उन्होंने बताया कि जेल प्रशासन का उद्देश्य कैदियों को केवल व्यस्त रखना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा हुनर देना है जिससे वे भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकें। इसी उद्देश्य से अभी 90 दिनों का इलेक्ट्रिशियन प्रशिक्षण भी चल रहा है, जिसमें कैदियों को बिजली वायरिंग तथा पंखा, एसी, फ्रिज सहित अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मरम्मत का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

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सलाखों के पीछे उम्मीद की नई सुबह :

समस्तीपुर मंडल कारा की यह पहल इस बात का प्रमाण है कि अपराध करने वाला हर व्यक्ति हमेशा अपराधी नहीं रहना चाहता। यदि उसे सही मार्गदर्शन, अवसर और विश्वास मिले तो वह समाज का जिम्मेदार नागरिक बन सकता है। यहां कैनवास पर उभरती मिथिला पेंटिंग केवल कला का नमूना नहीं, बल्कि एक नए जीवन की उम्मीद है। रंगों से सजे ये चित्र मानो यह संदेश देते हैं कि गलती इंसान से हो सकती है, लेकिन सुधार की संभावना कभी समाप्त नहीं होती। यही सोच किसी भी सुधार गृह की सबसे बड़ी सफलता होती है।

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बयान :

जेल का उद्देश्य केवल कारावास सजा नहीं, बल्कि कैदियों को सुधारकर आत्मनिर्भर बनाना भी है। इसी सोच के तहत उन्हें मिथिला पेंटिंग और इलेक्ट्रिशियन जैसे कौशल का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। मुक्ति ब्रांड के माध्यम से उनकी बनाई पेंटिंग बाजार तक पहुंच रही हैं। हमारा प्रयास है कि जेल से बाहर निकलने के बाद वे हुनर के बल पर सम्मानजनक जीवन जी सकें।

प्रशांत कुमार ओझा, जेल अधीक्षक, मंडल कारा समस्तीपुर

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