Samastipur

एक साथ तीन मासूम भाईयों की जलती चिता देख कांप उठा हर किसी का कलेजा, कफन-लकड़ी तक के भी नहीं थे पैसे! चंदा जुटाकर हुआ तीनों भाइयों का अंतिम संस्कार

समस्तीपुर : समस्तीपुर जिले के शिवाजीनगर प्रखंड स्थित बोरज गांव में रामनवमी का उत्सव इस बार एक ऐसे दर्दनाक हादसे का गवाह बन गया, जिसे याद कर गांव का हर व्यक्ति सिहर उठता है। जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर करेह नदी के तट पर मंगलवार को एक साथ तीन सगे भाइयों की चिता जलने का दृश्य इतना मार्मिक था कि वहां मौजूद हर आंख नम हो गई। दिल्ली में रहकर निजी फैक्ट्री में गार्ड की नौकरी करने वाले सुदर्शन झा हर साल की तरह इस बार भी रामनवमी के अवसर पर अपने परिवार के साथ गांव आए थे।

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घर के सामने स्थित हनुमान मंदिर में आयोजित अष्टयाम यज्ञ में शामिल होने के लिए वह अपने तीनों पुत्र आदित्य कुमार झा (16 वर्ष), हर्षनाथ झा (13 वर्ष) और कार्तिक झा (11 वर्ष) के साथ पहुंचे थे। पूजा में शामिल होने के बाद 10 अप्रैल को वापस दिल्ली लौटने का टिकट भी कटा था, लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। सोमवार की दोपहर तीनों भाई अपने दादा विंदेश्वर झा, जो मंदिर के पुजारी हैं, उनके पास मंदिर में थे। मंदिर की साफ-सफाई करने के बाद वे पास ही बह रही करेह नदी को देखने चले गए। देखते ही देखते यह जिज्ञासा काल बन गई।

बताया जाता है कि स्नान के दौरान हर्षनाथ गहरे पानी में चला गया। छोटे भाई कार्तिक ने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन वह भी डूबने लगा। दोनों को संकट में देख बड़े भाई आदित्य भी उन्हें बचाने के लिए कूद पड़ा। लेकिन डूबते भाइयों ने घबराहट में आदित्य को पकड़ लिया और देखते ही देखते तीनों नदी की लहरों में समा गए। शोर सुनकर आसपास के लोग दौड़े और किसी तरह तीनों को बाहर निकाला, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक साथ तीनों भाइयों की मौत की खबर से पूरे गांव में मातम पसर गया।

पोस्टमार्टम के बाद मंगलवार को शव गांव पहुंचने पर करेह नदी के किनारे एक साथ तीनों मासूम भाईयों की चिताएं जलीं। यह दृश्य इतना हृदयविदारक था कि हर व्यक्ति की आंखें नम थीं। सबसे दुखद क्षण तब आया जब जिन हाथों को बच्चों के कंधे पर होना चाहिए था, वही परिजन उन्हें मुखाग्नि दे रहे थे। आदित्य को उसके चचेरे दादा तारकेश्वर झा ने मुखाग्नि दी, जबकि हर्षनाथ और कार्तिक को उनके चाचाओं ने अंतिम विदाई दी। तारकेश्वर झा की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने भरे गले से कहा की आज मुझे मुखाग्नि की जरूरत थी, लेकिन मैं अपने ही पोते को मुखाग्नि दे रहा हूं। इससे बड़ा दुख क्या हो सकता है। हमारी तो दुनिया ही उजड़ गई।

इस हादसे के बाद सुदर्शन झा और उनकी पत्नी गहरे सदमे में हैं। दोनों की हालत ऐसी है कि वे कुछ बोल भी नहीं पा रहे, बस आने-जाने वाले लोगों को खामोशी से देखते रहते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर है। तीनों बेटों के अंतिम संस्कार तक के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे में गांव के लोगों ने मानवता की मिसाल पेश करते हुए चंदा जुटाकर कफन और लकड़ी की व्यवस्था की और अंतिम संस्कार कराया। पड़ोसी संजय झा ने बताया कि तीनों बच्चे दिल्ली में रहकर पढ़ाई करते थे। आदित्य ने इस साल मैट्रिक की परीक्षा दी थी, जबकि हर्षनाथ आठवीं और कार्तिक सातवीं कक्षा का छात्र था।

गांव के 70 वर्षीय राधाकांत झा कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा दर्दनाक मंजर कभी नहीं देखा। एक ही परिवार के तीनों चिराग एक साथ बुझ जाना पूरे गांव के लिए असहनीय है। इस घटना के बाद प्रशासनिक अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों ने मदद का आश्वासन जरूर दिया है, लेकिन अभी तक कोई ठोस सहायता नहीं मिल सकी है। बोरज गांव में तीन मासूम जिंदगियों के असमय बुझ जाने का दर्द हर जुबान पर है। यह हादसा एक परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे गांव के दिल पर ऐसा घाव दे गया है, जो शायद कभी नहीं भर सकेगा।

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Avinash Roy

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