समस्तीपुर : शहर के काशीपुर में सन् 1890 में स्थापित ब्रिटिश कालीन शिक्षण संस्थान किंग एडवर्ड हाई स्कूल (केईएच स्कूल) को नए नाम से नई पहचान देनेवाले इस विद्यालय के 11वें प्राचार्य सह राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान से सम्मानित डॉ. राम खेलावन प्रसाद का निधन हो गया है, लेकिन वे आज भी अपने कार्यो व योगदान को लेकर पूर्व छात्रों के लिए अविस्मरणीय है। पूर्व छात्र सह अधिवक्ता प्रकाश कुमार, सीए पंकज ज्योति बताते है कि वर्ष 1992 में शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा द्वारा राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार प्रदान किया गया था।
प्राचार्य पद ग्रहण करने के साथ ही डॉ. राम खेलावन प्रसाद ने इस इंटर विद्यालय को अंग्रेजी शासन की पहचान को मिटाते हुए महाविद्यालय का नाम किंग एडवर्ड इंटर स्कूल से आरएसबी इंटर विद्यालय करवाया। साथ ही उन्होंने अपने अथक प्रयास से यहां के छात्र और आजादी की लड़ाई लड़ने वाले रामलखन और शारदानंदन के नाम से महाविद्यालय का नाम राज्य सरकार से करवाया जो विद्यालय के लिए यादगार सौगात दे दी। आज यह विद्यालय आदर्श रामलखन शारदानंदन बालक इंटर स्कूल के रूप में शिक्षा प्रदान कर रहा है।
पूर्व छात्र प्रकाश कहते है कि शिक्षक अपने विद्यार्थियों के जीवन पर गहरा प्रभाव डालते है। न केवल वे जो सिखाते हैं, बल्कि अपने व्यक्तित्व के माध्यम से भी। एक महान शिक्षक धैर्य, सहानुभूति, रचनात्मकता और लचीलेपन का प्रतीक होता है। ये गुण छात्रों को चुनौतियों का सामना करते समय सहारा महसूस कराने में मदद करते हैं, उन्हें प्रयास करने, असफल होने और फिर से प्रयास करने की शक्ति प्रदान करते हैं। इन गुणों को अपनाकर, शिक्षक आत्मविश्वास, जिज्ञासा और आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति को प्रेरित करते हैं। कुछ ऐसे ही स्व. प्रसाद भी थे।
सीए पंकज बताते है कि शिक्षण केवल एक नौकरी नहीं है—यह भावी पीढ़ियों को आकार देने की एक व्यक्तिगत प्रतिबद्धता है। अच्छे शिक्षक उन्हीं गुणों का अनुकरण करते हैं जिन्हें वे अपने छात्रों में विकसित करना चाहते हैं: स्पष्ट संचार, भावनात्मक जागरूकता, अनुकूलनशीलता और सत्यनिष्ठा। ये गुण सकारात्मक कक्षा संस्कृति को बढ़ावा देते हैं, अन्वेषण को प्रोत्साहित करते हैं, और प्रत्येक शिक्षार्थी को यह महसूस कराते हैं कि उसे देखा और समर्थन दिया जा रहा है।
वर्तमान प्राचार्य डॉ. ललित कुमार घोष ने कहा कि स्व. प्रसाद अपने कार्य के प्रति समर्पित थे। वे अपने अनुशासन को लेकर काफी लोकप्रिय थे।उन्होंने 11 वें प्राचार्य के रूप में इस विद्यालय में योगदान दिया और 3 अक्टूबर 1993 से 28 फरवरी 2002 तक अपने पद पर रहे। उन्होंने शैक्षणिक वातावरण बना छात्र छात्राओं की उपस्थिति सुनिश्चित कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके द्वारा पढ़ाए गए दर्जनों छात्र-छात्राएं आज उच्च पदों पर आसीन हैं।
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