समस्तीपुर/विद्यापतिनगर [पदमाकर सिंह लाला] : कौन सुनेगा… किसको सुनाए, इसीलिए अपने ही किस्मत को कोस गंगा मईया से कह कर चुप रह जाते हैं! सरकार हमारी सुनती नहीं, अधिकारी गांव में आते नहीं, किसे सुनाए अपनी परेशानी…! ये बात बोलते ही मऊ दियारा की सीता देवी के आंखों में बाढ़ से बेबसी स्पष्ट परिलक्षित हो रही है। समस्याओं के दामन तले दबी यह बेबसी महज सीता की ही नहीं है। वार्ड संख्या तेरह में एक नवविवाहिता प्रसव पीड़ा से गुजर रही हैं। स्वजनों के पास पैसे भी हैं लेकिन एक अदद नाव का इंतजार, घर के लोगों को किसी अनजाने भय का डर सता रहा है।
घर के कुछ सदस्य तो एक सप्ताह पहले ही वाया नदी के उस पार चिंगिया बांध पर पशु मवेशियों के साथ शरण ले चुके हैं। लेकिन इस विपरीत हालत में गर्भवती महिला को कहां जाने देते। सोचा कि गंगा मईया जल्द चली जाएगी तो शब कुछ सही तरीके से हो जायेगा। शेरपुर लोदियाही दियारा के हालात भी बाढ़ से बदतर हैं। यहां कि लालझरी देवी कहती हैं कि सैकड़ों लोगों का घर बाढ़ के पानी से घिर गया है। परिवार के सदस्यों ने ऊंचे स्थानों पर आश्रय ले रखा है। छोटे छोटे बच्चों के साथ हमलोग अभी तक यहीं घिरे हुए हैं। कारण घरों में रखे मूल्यवान सामानों को कहां ले जाएं। कहीं कोई चोर…!
लोदियाही गांव की रहनेवाली चनरी देवी का झोपड़ीनुमा घर वाया नदी के पानी में डूब चुका है। चनरी अपने परिवार के साथ तटबंध के किनारे रहती है। बताती है कि गांव में सरकारी नल लगा है, लेकिन सूख चुका है…! उस पार से पानी डिब्बा में भर कर ले जाते हैं । कई बार बाढ़ का पानी पीने की मजबूरी बनी हुई है।
चिंगिया बांध पर बसेरा बनाएं हुए बाढ़ पीड़ित अजय राय, नितेश राय, सुरेश राम, सतन दास आदि पास आते ही घेर लेते हैं। कहते है मेरी भी समस्या सुनते जाईए… पिछली बार बाढ़ आई तो इन इलाकों में कम्युनिटी किचेन प्रशासन के द्वारा खोला गया था। जिससे खाने-पीने को लेकर कोई परेशानी नहीं थी, इस बार ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है। नतीजा चुरा फांक कर समय कट रहा है।
गोपालपुर दियारा की जयंती देवी कहती हैं कि मवेशियों को किसी तरह से बाहर निकाल दिया गया, लेकिन खाने-पीने का जो सामान घर पर था, वह बर्बाद हो गया। अब मां-बाप के साथ बाजिदपुर पुल के किनारे रहने को मजबूर है। खाने-पीने में बहुत समस्या हो रही है। वहीं ज्ञांति देवी ने बताया कि सबसे अधिक परेशानी पीने के पानी को लेकर है। गांव की श्रीकांति देवी, ज्ञांति देवी, दुलारो देवी ने बताया कि घरों में पानी घुस चुका है और आसमान से बारिश बरस रही है। दिन हो या रात, बच्चे और महिलाएं सड़क किनारे शरण लिए हैं। जिंदगी इन परिवारों की चचरी पर ही कट रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि अभी तक राहत शिविर, चारा वितरण, शौचालय , पानी, स्वास्थ्य शिविर और फसल नुकसान का सर्वे कार्य की बात तो दूर एक पॉलीथिन शीट तक नहीं दिया गया हैं । बाढ़ के बीच रहने-खाने, शौचालय, पशुचारा और आवागमन जैसी बुनियादी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।
प्रभावित लोगों का आरोप है कि सरकारी नावें उपलब्ध नहीं कराई गईं, जिससे उन्हें गैर-मानक निजी नावों का सहारा लेना पड़ रहा है। इन नावों से अस्थायी राहत जरूर मिल रही है, लेकिन जीवन और संपत्ति दोनों खतरे में हैं। नाविक मोटा किराया वसूल रहे हैं तो कई लोग केले के थंब और चचरी नावों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
बाढ़ पीड़ित पशुपालकों के लिए अपने मवेशियों को बचाना और उनके लिए चारा जुटाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। खेतों में लगी हरी चारा फसलें डूब जाने से संकट गहरा गया है। सरकारी मदद के अभाव में पशुपालक तटबंधों, स्कूल परिसरों और सड़कों के किनारे खुले में रात बिताने को मजबूर हैं।
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