समस्तीपुर/सरायरंजन : बिहार विधानसभा चुनाव चंद महीने दूर हैं। सियासी बिसात पर शह मात का खेल भी शुरू हो चुका है। समस्तीपुर जिले का सरायरंजन विधानसभा सीट पिछले डेढ़ दशक में राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण रहा है। साल 2010 से लेकर 2020 तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में इस सीट ने जेडीयू को जिताकर सदन में भेजा है। भले ही जेडीयू कभी बीजेपी तो कभी राजद के साथ गठबंधन में रही हो। 2005 में यह सीट राजद के पास थी, जिसे अब तक राजद वापस नहीं पा सका है।
बिहार में 2005 में दो बार चुनाव कराने पड़े थे। पहली बार चुनाव फरवरी में हुए थे और दूसरी बार अक्तूबर में हुए थे। दोनों ही चुनावों में राजद को ही जीत मिली थी। इस बार राजद भी अपना उम्मीदवार बदल चुकी थी। फरवरी 2005 में राजद के राम चन्द्र सिंह निषाद ने लोक जन शक्ति पार्टी के साजन कुमार मिश्रा को 9,476 वोट से हरा दिया था। अक्तूबर 2005 के चुनाव में एक फिर से राजद से रामचंद्र सिंह निषाद को जीत मिली थी। इस बार उन्होंने जदयू के विजय कुमार चौधरी को 9,270 वोट से हराया था।
इधर जिले में 2009 की परिसीमन के बाद सरायरंजन विधानसभा क्षेत्र का ढांचा बदल गया। इसके तहत मोरवा प्रखंड को हटाकर इसमें विद्यापतिनगर प्रखंड को जोड़ दिया गया। इसमें सरायरंजन की 23 और विद्यापतिनगर की 14 पंचायतों को मिलाकर सरायरंजन विधानसभा का गठन किया गया। इस बदलाव के कारण चुनाव के जातीय समीकरण में भी परिवर्तन आया।
इसके बाद वर्ष 2010 का चुनाव बिहार में बदलाव की बयार लेकर आया। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने “विकास” को चुनावी मुद्दा बनाया और इसका असर सरायरंजन में भी दिखाई दिया। विजय कुमार चौधरी ने लगभग 17 हजार वोटों से जीत दर्ज कर सीट को एनडीए की झोली में डाला। यह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लोकप्रियता के प्रति भरोसे का संकेत था।
इसके बाद 2015 में राजनीतिक समीकरण बदले। जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस ने मिलकर महागठबंधन बनाकर बीजेपी को टक्कर दी। सरायरंजन में जेडीयू के विजय कुमार चौधरी ने भाजपा के युवा चेहरा रंजीत निर्गुणी को हरा कर जीत हासिल की। जीत के बाद विजय चौधरी को विधानसभा का अध्यक्ष चुन लिया गया।
इसके बाद वर्ष 2020 का चुनाव नीतीश कुमार की लोकप्रियता में आई गिरावट और सत्ता विरोधी माहौल के बीच लड़ा गया। विपक्ष में खड़ी राजद ने विकास कार्यों में कथित कमी और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को उठाया। आरजेडी ने एक नये चेहरे के रूप में अरविंद कुमार सहनी को उतारा और इस बार जेडीयू की जीत का अंतर घटकर मात्र 3,624 रह गया। वहीं एलजेपी कैंडिडेट आभाष कुमार झा 11 हजार दो सौ 24 वोट लाकर तीसरे स्थान पर रहे थे। हालांकि जीत जेडीयू की हुई, लेकिन नतीजे ने यह साफ कर दिया कि जनता बदलाव पर गंभीरता से विचार कर रही है। अभी श्री चौधरी नीतीश सरकार में जल संसाधन और संसदीय कार्य मंत्री हैं।
इस बार विजय कुमार चौधरी सड़कें, पुल, पुलिया, बिजली, नगर पंचायत, मेडिकल और इंजीनियरिंग काॅलेज, समेत अन्य विकास के मुद्दों पर चुनाव लड़ेंगे। लेकिन देखना दिलचस्प होगा की इस बार जनता यह सीट राजद के झोली में डालती है या एक बार फिर से विजय कुमार चौधरी इस सीट को जीतकर नीतीश कुमार की झोली में डालते हैं।
वर्ष 2011 के पंचायत चुनाव में जिला परिषद सदस्य बनकर क्षेत्र में युवा नेता के रूप में उभरे रंजीत निर्गुणी आज के समय में भाजपा में हैं। 2015 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी अब तक लगातार क्षेत्र में बने हैं। बीते पंद्रह वर्षों में पंचायत राज, शिक्षा, वाणिज्यिक कृषि, कला-संस्कृति जैसी तमाम गतिविधियों से उन्होंने सरायरंजन विधानसभा समेत पुरे जिले में अपनी एक अलग पहचान बनाने का काम किया है। साथ ही सभी सामाजिक वर्गों के बीच बीते 15 वर्षों से निरंतर बने रहने के कारण उनकी सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ी है।
उन्होंने भी सरायरंजन से विधानसभा चुनाव 2025 सरायरंजन से ही लड़ने की घोषणा अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर कर दिया हैं। लेकिन उन्होंने अभी यह चर्चा नही की है की वह किसी पार्टी के सिंबल पर या फिर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ेंगे। आज के समय में रंजीत निर्गुणी की गिनती भाजपा के वरीय नेताओं में होती है, जबकि सरायरंजन सीट एनडीए की सहयोगी दल जदयू के खाते में है, जिसपर बिहार सरकार के दिग्गज मंत्री और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी विजय कुमार चौधरी लगातार तीन बार से जीतते रहे हैं। अब देखना यह है कि इस बार रंजीत निर्गुणी भाजपा के सिंबल पर ही चुनाव लड़ते हैं या फिर किसी अन्य दल से अपनी किस्मत आजमाते हैं। क्षेत्र में चल रही चर्चा के अनुसार महागठबंधन का एक घटक दल उनके संपर्क में है, और निर्गुणी को अपना उम्मीदवार बनाने पर विचार कर रही है। बताते चलें की अगर महागठबंधन रंजीत निर्गुणी को अपना उम्मीदवार बनाती है तो मुकाबला काफी दिलचस्प होगा।
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