Samastipur

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा में लीची प्रदर्शनी का किया गया आयोजन

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समस्तीपुर/पूसा : विश्व स्तर पर बिहार के लीची की नई पहचान दिलाने के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा एवं राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र मुजफ्फरपुर के द्वारा प्रथम लीची शो का आयोजन किया गया। इस लीची प्रदर्शनी का उद्घाटन कुलपति डॉ. पीएस पांडेय ने किया।

लीची को फलों की रानी कहा जाता है, लीची बिहार की पहचान है। लीची अपने विशिष्ट स्वाद, सुगंध एवं और सुंदरता की वजह से लोगों की पहली पसंद होती है। उत्तरी बिहार की विशिष्ट कृषि-जलवायु विशेषताएं, विशेष रूप से मुजफ्फरपुर क्षेत्र में असाधारण गुणवत्ता वाले लीची के फल पैदा होते हैं जो देशभर में मशहूर है।

बिहार में 308.08 हजार मीट्रिक टन लीची का उत्पादन होता है जबकि इसकी खेती 36.67 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में होती है। बिहार सबसे बड़ा लीची उत्पादक प्रदेश है। मुजफ्फरपुर के लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र में शाही लीची की खेती होती है। इसे शाही लीची की राजधानी भी कहते है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा द्वारा आयोजित प्रथम लीची महोत्सव को लेकर विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं में भी खासा उत्साह देखने को मिला। लीची महोत्सव में छात्र-छात्राओं के लिए लीची खाने की प्रतियोगिता, लीची पर फोटो गैलरी, लीची पर क्राफ्ट मेकिंग और स्लोगन आदि जैसे कई आकर्षक कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया। इसके अलावे बच्चों के द्वारा लीची से कई तरह के जूस और स्क्वेस और ड्राई प्रोडक्ट तैयार किये गए है। ताकि ऑफ सीजन में लीची प्रॉडक्ट का लोग लुफ्त उठा सके।

इस लीची महोत्सव के आयोजन को लेकर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पीएस पांडे का कहना है कि लीची इस इलाके की शान और पहचान है। खासकर शाही लीची की पहचान पूरे विश्व में है। लीची महोत्सव के माध्यम से विश्व को संदेश देना चाहते हैं कि यहां की लीची क्वालिटी में सर्वोपरि है। उनके पास शाही के अलावे के और वैरायटी भी है। केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा और राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के द्वारा और भी लीची के किस बुक को विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।

कुलपति का बताना है कि लीची का एक्सपोर्ट पोटेंशियल काफी है, देश के लोग तो इस लीची का आनंद ले रहे है। लेकिन विश्व के अन्य देशों तक प्रचार प्रसार और टेक्नोलॉजी के माध्यम से कैसे पहुँचाया जाय इस पर भी प्रयास हो रहे है। चुकीं लीची काफी कम समय के लिए मिलती है ऐसे में वैज्ञानिक कुछ ऐसे किस्मत को विकसित करने में लगे हैं ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा समय तक लीची का लुफ्त उठा सकें।

Avinash Roy

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