सटीक रणनीति, सोशल इंजीनियरिंग और जनता तक योजनाओं का लाभ पहुंचाकर एनडीए ने इस बार बड़ी जीत प्राप्त की है। जदयू का लव-कुश (कोइरी-कुर्मी) वोट बैंक पूरी तरह से एकजुट रहा। वैश्य, स्वर्ण के साथ ही छोटी-छोटी जनसंख्या वाली जातियां भाजपा के नेतृत्व में एनडीए के पक्ष में गोलबंद हुईं।
अनुसूचित जाति का साथ भी एनडीए को मिला और यादव वोटों में विभाजन भी हुआ। दूसरी तरफ महागठबंधन के आधार वोट बैंक में बिखराव दिखा। माय (मुसलमान-यादव) समीकरण पूरी तरह से दरक गया। सीमांचल में जहां मुस्लिम ओवैसी के साथ हो गए। वहीं, कोसी में एनडीए के यादव प्रत्याशी महागठबंधन के यादव प्रत्याशी पर भारी पड़ गए।
पिछड़ा (ओबीसी) और अति-पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) को लुभाने की कांग्रेस की मशक्कत किसी काम की नहीं रही और मल्लाह, बिंद, नोनिया, केवट वोटों की सौदागर बनी विकासशील इंसान पार्टी (वीआइपी) की मतदाताओं ने एक नहीं सुनी। बहुत पहले से ईबीसी एनडीए, विशेषकर नीतीश कुमार के लिए प्रतिबद्ध रहा है। उसमें सेंधमारी करने के किसी भी प्रयास में इस बार महागठबंधन को सफलता नहीं मिली।
इस बार दोनों गठबंधनों यानी एनडीए और महागठबंधन की ओर से अपने आधार वोटरों का ध्यान रखते हुए दूसरी जातियों के जुझारू चेहरों को भी मैदान में उतारा गया। अलबत्ता भाजपा ने किसी मुसलमान पर अपनी ओर से दांव नहीं उतारा, लेकिन एनडीए की ओर से पांच मुसलमान भी प्रत्याशी रहे।
राजद ने सबसे अधिक यादवों और मुस्लिमों पर दांव लगाया, लेकिन उसका माय समीकरण सफल नहीं हो सका। ईबीसी को टिकट देने में जदयू आगे रहा। सफलता भी उसी अनुपात में मिली। पूर्व बिहार, कोसी और सीमांचल के 62 सीटों में से 11 पर एनडीए के कुशवाहा, कुर्मी और धानुक विधायक जीतने में सफल रहे।
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