Bihar

तेजस्वी के तूफानी दौरे पर नीतीश ने पानी फेरा, JDU के अति पिछड़ों ने बचा ली NDA की लाज

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लोकसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं। और बिहार में एनडीए वैसा प्रदर्शन नहीं कर सकी, जिसकी वो उम्मीद कर रही थी। हालांकि अति पिछड़े जो जेडीयू का वोट बैंक कहा जाता है। उसने एनडीए की लाज जरूर बचा ली। 2019 में एनडीए बिहार में जिस शिखर पर था। वैसा प्रदर्शन 2024 के चुनावों में नहीं कर सकी। और 2014 के बाद अबतक के चुनावों में बीजेपी की सबसे कम सीटें आई। हालांकि इंडिया अलायंस के प्रदर्शन में सुधार देखा गया। 2019 में सिर्फ एक सीट महागठबंधन ने जीती थी। लेकिन बढ़त बनाने में नाकाम रही।

जमीनी हकीकत, गरीबी और बेरोजगारी के स्थानीय मुद्दों पर तेजस्वी के तूफानी चुनाव प्रचार के बावजूद महागठबंधन वैसा परफॉर्म नहीं कर पाई। जिसकी उम्मीद आरजेडी समेत सहयोगी दल लगाए बैठे थे। बिहार में एनडीए फिर भी 30 सीटें जीतने में कामयाब रहा, जिसमें कुछ करीबी नतीजे भी शामिल है। जबकि विपक्ष ने 9 सीटें जीतीं और एक सीट निर्दलीय के खाते में गई। यह 2014 के बाद से बिहार में एनडीए की सबसे कम सीटों की संख्या है।

एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर के मुताबिक चुनाव से पता चला है कि बिहार के लोग भाजपा के साथ जुड़ना चाहते हैं, लेकिन इसकी आक्रामक सांप्रदायिक राजनीति को स्वीकार नहीं करते हैं। यह आरक्षण और संविधान जैसे मुद्दों के संवेदनशील प्रबंधन को भी उजागर करता है। एक और खास बात वो ये कि नीतीश कुमार हमेशा की तरह बिहार के लिए महत्वपूर्ण बने हुए हैं। बिहार में बीजेपी की टॉप लीडरशिप में खालीपन को भरने का काम कर रहे हैं।

डीएम दिवाकर ने कहा कि आरजेडी महागठबंधन के प्रदर्शन का लाभ नहीं उठा सका। तेजस्वी के तूफानी दौरों के नीतीश कुमार ने काफी हद तक बेअसर किया। और आरजेडी को पीछे धकलेने का काम किया। बिहार में पीएम मोदी का भी हालांकि मुझे नहीं लगता कि नीतीश कुमार ने कुछ असाधारण काम किया है। क्योंकि बिहार में नरेंद्र मोदी को समर्थन पहले से भरपूर मिल रहा था। हालांकि इसके बावजूद आरा और काराकाट की सीट लंबे समय बाद भाकपा माले जीतने में सफल रही।

वहीं बीजेपी के सहयोगी दल जेडीयू और एलजेपी-आर बिहार में बेहतर स्ट्राइक रेट के साथ लौटे। भाजपा ने सबसे अधिक 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ 12 सीटें जीत सकीं, जेडीयू ने भी 16 में से 12 सीटें जीतीं और एलजेपी ने अपनी सभी पांच सीटें जीतीं। HAM-S ने एकमात्र सीट जीतन राम मांझी ने गया से जीती। एलजेपी-आर प्रमुख ने पारंपरिक हाजीपुर सीट जीती, जिसे उनके पिता दिवंगत राम विलास पासवान ने नौ बार जीता था और उन्होंने अपने चाचा पशुपति कुमार पारस के साथ झगड़े के बाद पहली बार चुनाव लड़ा, जिन्होंने 2019 में 6 सीटें जीती थीं।

काराकाट में, राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के प्रमुख और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा सीपीआई-एमएल के राजा राम सिंह और स्वतंत्र भोजपुरी स्टार पवन सिंह के बीच फंस गए और हार गए। पूर्णिया में, पप्पू यादव ने निर्दलीय के रूप में सीट जीती। बिहार में किसी निर्दलीय द्वारा जीती गई पूर्णिया एकमात्र सीट है। जेडीयू और आरजेडी से लिफ्ट नहीं मिलने के बाद पप्पू यादव कांग्रेस में शामिल हो गए थे, लेकिन जब सीट बंटवारे में उन्हें पूर्णिया सीट नहीं दी गई तो उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा।

इंडिया अलायंस की सहयोगी सीपीआई माले को दो सीटें (आरा और काराकाट), कांग्रेस को तीन (सासाराम, कटिहार और किशनगंज) और राजद को चार (जहानाबाद, औरंगाबाद, बक्सर और पाटलिपुत्र) मिलीं। आरजेडी ने भाजपा का गढ़ बक्सर छीन लिया, जहां भाजपा ने केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे की जगह नए उम्मीदवार मिथिलेश तिवारी को मैदान में उतारा था, जो पूरे समय प्रचार से दूर रहे। वहीं राजद प्रमुख जगदानंद सिंह के बेटे और बिहार के पूर्व मंत्री सुधाकर सिंह ने बक्सर की सीट जीती। जगदानंद सिंह ने 2009 में भी इस सीट से जीत हासिल की थी।

बिहार में एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि एनडीए को अपने पारंपरिक गढ़ बक्सर, सासाराम, आरा और यूपी के पड़ोसी शाहाबाद क्षेत्र के काराकाट में बड़ी हार का सामना करना पड़ा। वह चारों सीटें हार गई। पिछले विधानसभा चुनाव में भी शाहाबाद क्षेत्र ने एनडीए को परेशान किया था। बीजेपी पड़ोसी औरंगाबाद सीट भी हार गई। सीमांचल क्षेत्र में, जहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है, कांग्रेस और राजद को किशनगंज, कटिहार और पूर्णिया से जीत की उम्मीद थी। किशनगंज एकमात्र सीट थी जो एनडीए 2019 में हारी थी।

वहीं चुनाव लड़ रही राजद प्रमुख लालू यादव की दोनों बेटियों की किस्मत मिलीजुली रही। जहां मीसा भारती अपने तीसरे प्रयास में पाटलिपुत्र से भाजपा के रामकृपाल यादव के खिलाफ जीत गईं, वहीं रोहिणी आचार्य सारण में भाजपा के राजीव प्रताप रूडी से हार गईं। समस्तीपुर से एलजेपी-आर की सबसे युवा उम्मीदवार शांभवी चौधरी ने कांग्रेस के सनी हजारी के खिलाफ भारी अंतर से जीत हासिल की। दोनों उम्मीदवार जदयू मंत्री अशोक चौधरी और महेश्वर हजारी की बेटी और बेटे हैं।

2019 में अपनी झोली में 39 सीटों के साथ, एनडीए के पास और ऊपर जाने की कोई गुंजाइश नहीं थी, जबकि राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नज़र इस बात पर थी कि इनकी सीटें कितनी गिर सकती हैं और क्या यह 2014 के 31 के आंकड़े को बरकरार रख पाएगी।

Avinash Roy

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