Bihar

Lok Sabha Election 2024: विरासत की जंग में बढ़ा भतीजे का कद, चाचा तलाश रहे नया विकल्प

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Lok Sabha Election 2024 विरासत की सियासत को लेकर चाचा-भतीजे के बीच छिड़ी जंग ने हाजीपुर (सु.) लोकसभा क्षेत्र को हॉट सीट बना दिया है. एनडीए में सीट शेयरिंग की घोषणा के बाद भतीजे का पलड़ा भारी दिख रहा है. हाजीपुर, वैशाली समेत पांच सीटें लोजपा (रामविलास) को मिली हैं. इस हॉट सीट से लोजपा (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान लड़ने वाले हैं. वे इस सीट को अपने पिता दिवंगत राम विलास पासवान की विरासत बताते रहे हैं. हाजीपुर सीट से चिराग का लड़ना तय हो चुका है. वहीं, एनडीए से तरजीह नहीं मिलने की वजह से पारस हाजीपुर से चुनाव लड़ने के लिए नये विकल्प की तलाश में जुटे हैं. वहीं, महागठबंधन ने भी अभी तक अपना पत्ता नहीं खोला है.

कई सालों तक रामविलास ने किया था इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व

करीब चार दशक तक यहां की राजनीति में शीर्ष पर रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री दिवंगत रामविलास पासवान वर्ष 1977 में हाजीपुर आये थे और तब से वे हाजीपुर के ही होकर रह गये थे. वर्ष 1977 से 2014 तक वे हाजीपुर से चुनाव लड़े. इस दौरान दो बार वर्ष 1984 और 2009 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 1977 में रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज कर उन्होंने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराया था. वर्ष 1989 में भारी मतों से जीत दर्ज कर उन्होंने अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ा था. वे अपनी सभाओं में अक्सर यह कहा करते थे कि हाजीपुर से उनका मां-बेटे का अटूट रिश्ता है. जीवन भर बेटे की तरह हाजीपुर की सेवा करता रहूंगा.

चाचा-भतीजे के बीच हाजीपुर सीट पर अपनी-अपनी दावेदारी

उन्होंने इस वादे को निभाया भी. वर्ष 2019 में स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने अपनी विरासत छोटे भाई पशुपति पारस को सौंपी थी. वर्ष 2020 में रामविलास पासवान के निधन के कुछ समय बाद ही चाचा-भतीजे में राजनीतिक विरासत को लेकर तल्खी बढ़ने लगी. वर्ष 2021 में लोजपा दो गुटों में बंट गयी. पारस गुट में पार्टी के पांच सांसद आ गये, जबकि चिराग अकेले सांसद बचे. उसी वक्त से चाचा-भतीजे के बीच हाजीपुर सीट पर अपनी-अपनी दावेदारी शुरू हो गयी थी.

पासवान की सीट से पहली बार विधायक बने थे पारस

रालोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सह पूर्व केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस का राजनीतिक सफर वर्ष 1977 में शुरू हुआ था. उस वक्त खगड़िया जिले के अलौली विधानसभा क्षेत्र से उन्होंने पहली बार जनता पार्टी के टिकट से जीत दर्ज की थी. इसे महज संयोग ही कहेंगे, वर्ष 1969 में उनके बड़े भाई रामविलास पासवान ने अलौली विधानसभा सीट से जीत हासिल की थी. वर्ष 1977 में जब जेपी के निर्देश पर पासवान हाजीपुर की राजनीति में कूदे, तो उन्होंने अपने छोटे भाई पशुपति पारस को अपनी विरासत सौंप दी.

1980 का विधानसभा चुनाव हार गये थे पशुपति पारस

1977 में जनता पार्टी के टिकट से जीत हासिल करने वाले पशुपति कुमार पारस 1980 का विधानसभा चुनाव हार गये थे. बाद में वे 2010 तक लगातार इस सीट से विधायक रहे. वर्ष 2010 में जदयू व 2015 में राजद उम्मीदवार से पराजित होना पड़ा था.

Avinash Roy

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