चौठचंद्र पर्व आज, मिथ्या कलंक से बचने के लिए होती है पूजा, भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी अद्भुत कथा

तस्वीर : कुंदन कुमार राॅय

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चौठचंद्र पर्व आज मनाया जाएगा। इस पर्व को लेकर सुबह से ही लोगों के घरों में चहलकदमी तेज हो गई है और भक्तिभाव का माहौल बना हुआ है। महिलाएं चंद्रदेव को भोग लगाने के लिए प्रसाद बनाएंगी। सूर्यास्त होते ही और चंद्रोदय के साथ ही घर के आंगन या छत में सबसे पहले अरिपन (कच्चे चावल को पीसकर बनाए जाने वाली अल्पना या रंगोली) बनाई जाती है।

इस पर पूजा-पाठ की सभी सामग्रियों को रखकर गणेश और चांद की पूजा की जाएगी। पर्व में कई तरह के पकवान- खीर, पूड़ी, पिरुकिया (गुझिया) और मिठाई में खाजा-लड्डू तथा फल के तौर पर केला, खीरा, शरीफा, संतरा, दही प्रसाद के रूप होते हैं। मिथ्या कलंक से बचने के लिए मनाए जाने वाले पर्व पर हाथ में फल लेकर चंद्रमा का दर्शन किया जाता है।

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दिया जाएगा चंद्रामा को अर्घ्य :

श्रद्धालु पर्व के दिन नए मिट्टी के बर्तन में नियम निष्ठा से दही जमाकर चन्द्र को अर्पण करते हैं और शंख जल से चंद्रदेव को अर्घ्य देते हैं और डालिया या सूप भी चढ़ाते हैं। डालिया में नारंगी, सेब, केला, दही का छांछ आदि भरा जाता है। व्रती काफी निष्ठा से यह पर्व करती हैं। मान्यता है कि हाथ में जिस फल को लेकर चंद्र दर्शन को देखा जाता है, उस फल को कहीं दूसरी जगहों पर फेंकने पर मिथ्या कलंक से बचा जा सकता है। इसके कारण कई बार आस पड़ोस के लोगों के बीच कहासुनी भी हो जाती है। वहीं दही का अर्पण करने, शंख जल से अर्घ्य करने और स्यमन्तकों पाख्यान करने से मिथ्या कलंक नहीं लगता है।

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अद्भुत कथा- भगवान श्रीकृष्ण पर लगा था दोष :

सभी पर्व के पीछे एक पौराणिक कथा जरूर होती है। इस पर्व को इसलिए मनाया जाता है क्योंकि द्वारिकापुरी में सत्राजित को भगवान सूर्य से स्यमंतक एक मणि प्राप्त हुआ था। भगवान कृष्ण ने सत्राजित से कहा कि यह मणि आप राजा उग्रसेन को दे दें। सत्राजीत ने श्रीकृष्ण की बात अनसुनी कर दी।

इधर, एक दिन सत्राजित के भाई प्रसेन मणि लेकर वन में शिकार के लिए निकले। यहां जंगल में शेर के हमले से प्रसेन की मौत हो गई। वहीं शेर के मुंह में मणि देख जांबवंत उसे मारकर मणि ले लेते हैं। अब अफवाह फैल जाती हैं कि श्रीकृष्ण ने ही प्रसेन को मारकर मणि ले ली है। उनपर मिथ्या कलंक लगता है। चौठ के चंद्र को देखने से उनपर मणि चोरी का कलंक लगा था। लिहाजा, चंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए श्रीकृष्ण ने पूजा-अर्चना की और मिथ्या कलंक से मुक्त हुए। तब से लेकर आज तक चौठचंद्र पर्व मनाया जाता है।

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