समस्तीपुर में उपयोग के बिना बॉडी वॉर्न कैमरे पुलिस लाइन में फांक रहे धूल, सिर्फ ट्रैफिक थाने की पुलिस कर रही उपयोग

समस्तीपुर : पुलिस की कार्यप्रणाली को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से मुख्यालय द्वारा समस्तीपुर जिला पुलिस को उपलब्ध कराए गए बॉडी वॉर्न कैमरे आज खुद व्यवस्था की अनदेखी का शिकार बने हुए हैं। करीब 98 बॉडी वॉर्न कैमरे जिला पुलिस को मिले थे, जिनका उपयोग जिले के सभी थानों की पुलिस को पेट्रोलिंग, वाहन जांच और आम जनता से संवाद के दौरान करना था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। पुलिस लाइन से मात्र 22 बॉडी वॉर्न कैमरे ट्रैफिक थाना को उपलब्ध कराए गए हैं।
ट्रैफिक पुलिस के जवान कंधे पर कैमरा लगाकर नियमित रूप से वाहन जांच और यातायात व्यवस्था संभालते नजर आते हैं, जबकि शेष करीब 76 बॉडी वॉर्न कैमरे अब भी पुलिस लाइन में पड़े-पड़े धूल फांक रहे हैं। बताया गया है कि ट्रैफिक पुलिस के लिये अलग से 45 बॉडी वॉर्न कैमरे मुख्यालय से उपलब्ध कराये गये थे। इनमें से 22 कैमरे ट्रैफिक थाने को मिले, बाकी पुलिस लाइन में ही रखे हैं। इसके अलावे जिले के विभिन्न थानों नगर, मुफस्सिल, रोसड़ा, दलसिंहसराय, पटोरी, सरायरंजन, उजियारपुर, विभूतिपुर समेत अन्य सभी थानों में तैनात पुलिसकर्मियों को दिया जाना था, ताकि वाहन जांच के दौरान आम जनता के साथ होने वाली हर कार्रवाई रिकॉर्ड हो सके। इससे न सिर्फ पुलिस पर लगने वाले आरोपों की निष्पक्ष जांच संभव होती, बल्कि पुलिसकर्मियों की कार्यशैली में भी पारदर्शिता आती।

स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर सभी थानों में बॉडी वॉर्न कैमरों का सही तरीके से इस्तेमाल होता, तो पुलिस और आम जनता के बीच भरोसा और मजबूत होता। वहीं, पुलिस महकमे के भीतर भी यह चर्चा है कि कैमरों के वितरण और उपयोग को लेकर स्पष्ट निर्देश और निगरानी के अभाव में यह महत्वाकांक्षी योजना कागजों तक सिमट कर रह गई है। अब सवाल यह उठता है कि जब मुख्यालय से आधुनिक उपकरण भेजे गए हैं, तो उनका समुचित उपयोग क्यों नहीं हो रहा। क्या यह लापरवाही है या फिर व्यवस्था की कमजोरी। जरूरत इस बात की है कि पुलिस प्रशासन इस पूरे मामले की समीक्षा करे और जिले के सभी थानों में बॉडी वॉर्न कैमरे जल्द से जल्द उपलब्ध कराकर उनका नियमित उपयोग सुनिश्चित किया जा सके, ताकि तकनीक का लाभ आम जनता तक पहुंच सके।

कैमरे से होनी थी लाइव माॅनिटरिंग :
बॉडी वॉर्न कैमरों के लाइव फुटेज की मॉनिटरिंग के लिए डैशबोर्ड भी बनाए जाने थे, जहां से पदाधिकारी आनलाइन नजर रख सकते। पुलिसकर्मियों को बॉडी वॉर्न कैमरे देने का उद्देश्य चालान व्यवस्था में पारदर्शिता लाना भी था। अगर कोई व्यक्ति संबंधित ट्रैफिक पुलिसकर्मी पर किसी तरह का आरोप लगाता है, तो उस ट्रैफिक पुलिसकर्मी के बॉडी वॉर्न कैमरे की रिकार्डिंग खंगाली जाती। किसी भी बहस, विवाद या नियम उल्लंघन की स्थिति में रिकॉर्ड किया गया फुटेज साक्ष्य के रूप में काम करता है, जिससे पारदर्शिता बढ़ेती है।

पुलिस और वाहन चालकों के बीच अक्सर होते हैं विवाद :
अक्सर ट्रैफिक जांच के दौरान चालान या नियम उल्लंघन को लेकर पुलिस और गाड़ी चालकों के बीच विवाद होते हैं। पुलिस पर मनमानी के आरोप लगते हैं, जबकि पुलिस का कहना होता है कि लोग नियम तोड़ने के बाद दबाव बनाते हैं। बॉडी-वॉर्न कैमरे ऐसी स्थितियों में दोनों पक्षों के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करता है। जिला मुख्यालय में ट्रेफिक थाने की पुलिस तो बॉडी वॉर्न कैमरा उपयोग कर रही है, लेकिन अन्य सभी थानों में इसे अब तक नहीं भेजा गया है।
बयान :
मुख्यालय से प्राप्त 98 बॉडी वॉर्न कैमरों के वितरण और उपयोग को लेकर समीक्षा की जा रही है। 22 कैमरे ट्रैफिक थाने को दिया गया है। तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से सभी थानों में कैमरे अभी उपलब्ध नहीं कराए जा सके हैं। जल्द ही सभी थानों को बॉडी वॉर्न कैमरे उपलब्ध कराकर उनके नियमित उपयोग और मॉनिटरिंग की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।
नरेंद्र शर्मा, लाइन डीएसपी, समस्तीपुर




