समस्तीपुर : पुलिस एवं अस्पताल प्रबंधन की उदासीनता के कारण दशकों से अधिक समय से जांच के अभाव में सैकड़ों आत्माएं न्याय की आस में भटक रही है। मृतकों के विसरा जांच के अभाव में न्याय की आस लगाए पड़े हैं। हालात ऐसे हैं कि पोस्टमार्टम हाउस से लेकर थानों तक मृतकों की आत्माएं मानो भटक रही हों। सदर अस्पताल स्थित पोस्टमार्टम हाउस से लेकर जिले के विभिन्न थानों तक वर्षों पुराना विसरा जांच के नाम पर रखा गया है। मुफस्सिल थाने पर मालखाना के पास तो विसरा झोला में लटक रहा है। रखा-रखा झोला भी सड़ गया। इसमें से कुछ विसरा मुजफ्फरपुर स्थित लैब से जांच होकर वापस भी थाना पर आ चुका है। लेकिन इसे रखने के लिये पर्याप्त जगह ना होने पर थाने में यत्र-तत्र ही रखा पड़ रहा है। अमूमन जिले के हर थानों का यही हाल है।
इधर पोस्टमार्टम हाउस परिसर में दो कमरों में मृतकों का दशकों पुराना विसरा भी जांच के नाम पर रखा-रखा सड़-गल गया है। कई साल बीत जाने के बावजूद इन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए भेजने की जहमत तक नहीं उठाई गई। धूल फांकते ये विसरा सिर्फ प्रशासनिक उदासीनता की कहानी नहीं कहते, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा भी बयां करते हैं, जो आज भी अपने परिजनों की मौत के सच का इंतजार कर रहे हैं। जांच नहीं होने की वजह से न तो मौत के कारणों का खुलासा हो पा रहा है और न ही दोषियों तक कानून का हाथ पहुंच पा रहा है।
सरकारी नियमों के अनुसार मृतकों के विसरा को सुरक्षित रखने के लिए वातानुकूलित भवन की व्यवस्था अनिवार्य है। कमरा साफ-सुथरा होना चाहिए, जिसमें न्यूनतम तापमान 8 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम 25 डिग्री सेल्सियस निर्धारित है। लेकिन समस्तीपुर में इन नियमों का पालन नहीं हो रहा है। विसरा को जीर्ण-शीर्ण हालत में, बिना किसी वैज्ञानिक सुरक्षा व्यवस्था के रखा गया है। सवाल यह उठता है कि आखिर कब इन मृतकों को न्याय मिलेगा।
सदर अस्पताल में पोस्टमार्टम करने वाली मंजू देवी ने बताया कि 150 वर्ष से भी अधिक पुराना विसरा भी सदर अस्पताल में रखा हुआ है, जो अब पूरी तरह से सड़-गल चुका है। वह अपने परिवार की पांचवी पीढ़ी है जो पोस्टमार्टम कर रही है। वह खुद सदर अस्पताल में 25 वर्षों से पोस्टमार्टम कर रही है। 150 वर्ष से भी पहले आजादी पूर्व अंग्रेजो के समय में उसके ससुर रामजी मल्लिक की दादी फुलझारू देवी ने सबसे पहले पुरानी पोस्टमार्टम गली में पोस्टमार्टम करना शुरू किया था। उसके बाद ससुर रामजी मल्लिक, फिर सास भुलिया देवी, फिर मंजू के पति रमेश मल्लिक ने पोस्टमार्टम किया। पति रमेश मल्लिक के गुजरने के बाद मंजू देवी खुद 25 वर्षों से पोस्टमार्टम कर रही है।
मंजू ने बताया कि अब विसरा जांच के लिये भी जाता है। पहले का कई विसरा सड़-गल गया है। 150 वर्ष से भी अधिक समय का विसरा ऐसे ही पोस्टमार्टम हाउस में रखा हुआ है। अधिकांश विसरा अज्ञात लोगों से ही संबंधित है। कुछ विसरा जहर खाने या खिलाने से हुई मौत के बाद जिसका पोस्टमार्टम कराया गया था वैसे लोगों का विसरा रखा हुआ है। बेसरा के रुप में मृतक का लिवर, हृदय, स्पीलिन, स्टोमेक तथा किडनी को सुरक्षित रखा जाता है।
एक वरीय पुलिस पदाधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर बताया कि विसरा जांच के लिए भेजने के लिए पांच से छह सौ रुपये लगता है। जिसे सरकार की ओर से धन राशि उपलब्ध नहीं कराई जाती है।
सरकारी नियम के अनुसार मृतकों का विसरा को सुरक्षित रखने के लिए वातानुकूलित भवन होना चाहिए। कमरा बिल्कुल साफ-सुथरा रहना चाहिए। कमरा का तापमान न्युनतम 8 डिग्री सेल्सियस तथा अधिकतम 25 डिग्री सेल्सियस रहना चाहिए। विसरा को मृतक के शरीर से बाहर निकालने के बाद उसे डिब्बा में बंद करने से पहले उसमें समुचित मात्रा में फोर्मेलिन नमक रासयनिक पदार्थ डालना चाहिए। फिर डिब्बा को एक लकड़ी के बॉक्स में रखा जाना चाहिए। लेकिन यहां ऐसे व्यवस्था नहीं है। जीर्ण-शीर्ण स्थिति में बिसरा को रखा गया है।
सदर अस्पताल में विसरा को सुरक्षित रखा जाता है। इसके जांच की जिम्मेदारी पुलिस की होती है। पुलिस को जब जरूरत पड़ती है वह अस्पताल से विसरा लेकर एफएसएल जाती है। वैसे सदर अस्पताल में बड़ी संख्या में पुराने विसरा पड़े है।
डॉ. एसके चौधरी, सिविल सर्जन, समस्तीपुर
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कई बार थाना स्तर पर ट्रांसफर-पोस्टिंग के कारण प्रभार ना मिलने पर बेसरा थाना और पोस्टमार्टम हाउस परिसर में ही पेंडिंग पड़ा ही रह जाता है। खासकर यूडी केसे में इसकी संख्या ज्यादा है। हर 15 दिनों पर मेरे निर्देश पर अलग-अलग टीम पटना व मुजफ्फरपुर एफएसएल जांच के लिये जाती है। जिले में बेसरा अधिक जमा हो गया है यह बात सही है। मुख्यालय को भी इसकी जानकारी दी गयी है। वहां से निर्देश मिलने पर इसका विनष्टीकरण भी किया जाएगा।
अरविंद प्रताप सिंह, एसपी समस्तीपुर
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