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रोसड़ा में कांग्रेस को नहीं मिला सहयोगी दलों का साथ, कभी रह चुकी थी कांग्रेस की मजबूत गढ़ो में से एक सीट

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समस्तीपुर : जिले की राजनीति में कांग्रेस की पकड़ लगातार कमजोर होती जा रही है। यह स्थिति रोसड़ा विधानसभा परिणामों में स्पष्ट दिखाई दी, जहां महागठबंधन के राजद और वामदलों के साथ तालमेल के बावजूद पार्टी को अपेक्षित संजीवनी नहीं मिल सकी। कांग्रेस उम्मीदवार बीके रवि भारी अंतर से चुनाव हार गए और पार्टी का जनाधार पिछले चुनाव की तुलना में और अधिक खिसकता हुआ दिखाई दिया। जिले में कांग्रेस इस बार केवल रोसड़ा सीट पर चुनाव मैदान में थी। यह सीट कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ मानी जाती थी। वर्ष 2015 में डॉ. अशोक कुमार ने यहां कांग्रेस को जीत दिलाई थी।

इससे पहले 2005 में यह सीट राजद के कब्जे में थी। लेकिन समय के साथ कांग्रेस की पकड़ यहां कमजोर पड़ती चली गई और 2020 में यह सीट भाजपा के खाते में चली गई। इस बार भी कांग्रेस को बड़ी उम्मीदें थीं कि महागठबंधन की संयुक्त ताकत तथा राजद व वाम दलों की जमीनी पहुंच कांग्रेस को फायदा दिलाएगी। लेकिन नतीजों ने यह संकेत दिया कि गठबंधन के स्तर पर वोटों का सहज और स्वाभाविक ट्रांसफर नहीं हुआ। महागठबंधन के घटक दलों का कैडर वोट कांग्रेस उम्मीदवार के खाते में पूरी तरह नहीं जा सका।

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भाजपा प्रत्याशी बीरेन्द्र कुमार ने 1,22,773 वोटों के साथ शानदार जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस के बीके रवि को मात्र 72,240 वोट मिले। अंतर 50,585 मत का रहा, जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि कांग्रेस न केवल हारती गई, बल्कि उसकी राजनीतिक जमीन और अधिक खिसक गई। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो 2020 में कांग्रेस के नागेन्द्र विकल को भाजपा से 35,744 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। इस बार हार का अंतर बढ़कर 50 हजार के पार चला गया, जो कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे की कमजोरी और क्षेत्र में घटती राजनीतिक पकड़ की ओर इशारा करता है।

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राजनीतिक पंडितों का कहना है कि कांग्रेस का जमीनी नेटवर्क कमजोर हुआ है। महागठबंधन के अंदर कैडर वोट का तालमेल प्रभावी नहीं रहा। राजद और वामदलों की संयुक्त उपस्थिति ने महागठबंधन की तस्वीर को मजबूत जरूर किया, लेकिन इसका लाभ कांग्रेस को नहीं मिल पाया। विशेषकर वह सीट जहां कभी कांग्रेस ने जनाधार बनाया था, वहां अब पार्टी अपने को बचाने की लड़ाई लड़ती दिख रही है। सियासी जानकारों की मानें तो रोसड़ा का परिणाम कांग्रेस के लिए एक बड़ा संदेश है कि अगर संगठन, कैडर, और जमीनी रणनीति में सुधार नहीं हुआ, तो महागठबंधन के सहारे भी कांग्रेस अपने जनाधार को बचा नहीं सकेगी।

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