समस्तीपुर: स्कूल में काम 4 घंटे का लेकिन रहना पड़ता है 8 घंटे, फिर भी मानदेय मिलता है महीने का सिर्फ 1650 रूपये

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समस्तीपुर : मिड डे मील योजना भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसका उद्देश्य स्कूलों में बच्चों को पौष्टिक भोजन प्रदान करना है। इस योजना के तहत, विभिन्न राज्यों में मिड डे मील रसोइयों को मानदेय दिया जाता है। वर्तमान में, मिड डे मील रसोइयों को साल में केवल 10 महीने का मानदेय मिलता है, जो कि 1650 रुपये प्रति माह होता है। इस मानदेय में केंद्र और राज्य सरकार का योगदान होता है। रसोइयों की स्थिति को लेकर उनके संघ के द्वारा कई वर्षों से सुधार की मांग की जा रही है। वर्तमान में उन्हें मिलने वाला 1650 रुपये उनकी मेहनत और कार्य के मुकाबले बहुत कम हैं। इतने कम वेतन पर हर कार्य दिवस में करीब 6 घंटों तक स्कूलों में उन्हें काम करना पड़ता है।
उनके काम की बात करें तो खाना बनाने, बच्चों को खाना परोसने से लेकर बर्तन धोने तक की उनकी जिम्मेदारी है। बता दें कि स्कूलों में बतौर रसोईये वही महिलाएं या पुरुष काम करते हैं जो आर्थिक रुप से बेहद कमजोर हैं। रसोइया के तौर पर ज्यादातर महिलाएं ही जुड़ी हुई हैं। उन महिलाओं की तादाद ज्यादा है जो विधवा हैं या जिनके पति बीमार रहते हैं। ऐसे में वे अपने बच्चों और परिवार का खर्च पूरा करने के लिए इस काम में लगी हैं।
बताया जाता है कि इस योजना के तहत जब स्कूलों में बच्चों के लिए खाना बनाने का काम शुरू हुआ था तो इन रसोइये को खाना बनाने के लिए 50 पैसा प्रति बच्चा मिलता था। यानी एक बच्चे का खाना बनाने पर 50 पैसा। धीरे-धीरे उनका पैसा बढ़ता गया और अब जाकर 1650 रुपये प्रति महीना तक पहुंचा है जो कि बेहद चिंताजनक है। राजकीय माध्यमिक विद्यालय खोड़ी लगुनियाँ सुर्यकंठ की रसोईया पूनम देवी ने बताया कि बिहार में रसोइया का मानदेय मात्र 1650 रूपये है, जिसमें कोई वृद्धि नहीं की गयी। जबकि तमिलनाडु, महाराष्ट्र, ओडिशा, हरियाणा सहित अन्य प्रदेश में हमसे बहुत अधिक मानदेय मिल रहा है। जितना मानदेय दिया जा रहा है, इस महंगाई में उससे गुजारा चलाना मुश्किल है। हमारी मांग है कि रसोइया को न्यूनतम मजदूरी गारंटी दी जाय और हर साल इसमें महंगाई भत्ता की वृद्धि की जाय। साथ ही मानदेय 10 हजार रूपये तत्काल की जाय।

वहीं प्राथमिक विद्यालय कन्या तिसवारा मोरवा के रसोईया अरूण कुमार का बताना है कि बिहार में रसोईया की स्थिति बिल्कुल दयनीय है। हम लोग अपने बच्चों को भूखें छोड़कर स्कूल पहुंच छात्र-छात्राओं के लिये मीड-डे मिल पकाते हैं। केंद्र सरकार और राज्य सरकार के मजदूर विरोधी निति के कारण हम रसोईयों का मानदेय अब तक नहीं बढ़ाया गया है। 1650 रूपये के मानदेय मेघर चलाना मुश्किल हो गया है। हम लोग अब तक इसी उम्मीद से काम कर रहे हैं की हमारा मानदेय बढ़ाया जाएगा। लेकिन सरकार की ओर से मानदेय बढ़ाने को लेकर अब तक कोई पहन नहीं की गई है।

उत्क्रमित मध्य विद्यालय मुसापुर की रसोईया मानती देवी का बताना है कि सरकार कहती है कि हमारे मानदेय बढ़ाने को लेकर राजकोष में अभी पैसें नहीं है लेकिन अन्य कामों के लिये बेफिजुल का खर्च किया जा रहा है। मात्र 1650 रूपये हमलोगों को मानदेय दिया जा रहा है जिसमें परिवार चलाना बेहद मुश्किल है। एक मजदूर भी मजदूरी करके हमसे अधिक पैसे कमा लेता है। वहीं प्राथमिक विद्यालय जितवारपुर निजामत यादव टोल की रसोईया जलेश्वरी देवी ने बताया कि हमलोगों के लिये छुट्टी का प्रावधान नहीं है। महिला को हर विभाग में दो दिनों का विशेषावकाश मिलता है लेकिन हम लोगों के यह नियम नहीं है। सभी विभागों में जब छुट्टी का प्रावधान है तो हम महिला रसोईयों को भी विशेषावकाश मिलना चाहिए।

वहीं प्राथमिक विद्यालय सोमनाहा कल्याणपुर के रसोईया राजेश्वर कुमार सिंह ने बताया कि हमें जितना मानदेय दिया जा रहा है, इस महंगाई में उससे गुजारा चलाना मुश्किल है। हमारी मांग है कि रसोइया को न्यूनतम मजदूरी गारंटी दी जाय और हर साल इसमें महंगाई भत्ता की वृद्धि की जाय। इसके साथ ही मानदेय 10 हजार रूपये तत्काल की जाय। इसके निजीकरण को रोका जाय, साल में 12 महीने का मानदेय दिया जाए, रसोईया को सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाये। केरल में हर रोज 650 रूपये के हिसाब से रसोईया को मिलता है। वहीं कर्नाटक में पांच हजार, तमिलनाडु में साढ़े तीन हजार, वहीं अपने बगल के ही राज्य झारखंड में भी साढ़े तीन हजार रुपये मिलता है लेकिन बिहार में मात्र 1650 रूपये मिल रहा है।
राजकीय माध्यमिक विद्यालय कोरबद्दा लगुनियाँ सूर्यकंठ की रसोईया मंजू कुमारी ने बताया कि हम लोग स्कूल में सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक रहते है। खाना बनाने से लेकर बर्तन साफ, झारू-पोछा लगाना से लेकर हर छोटा-बड़ा काम करते हैं लेकिन इसके बावजूद हमारा मानदेय 1650 रूपया ही है जो बेहद खेदजनक है। हम लोग गरीब तबके के बेहद कम पढ़े लिखे लोग है इसका मतलब यह नहीं है की हमें एक मजदूर से भी काफी कम पैसे दिये जाए। हमें बार-बार हटाने की धमकी भी दी जाती है। हम लोगों का परिवार है लेकिन इतने खम पैसों में परिवार चलाना काफी मुश्किल है। घर के दूसरे लोग मजदूरी करते हैं तो घर की रोजी-रोटी किसी तरह चल पाती है।

राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय लगुनियाँ सूर्यकंठ की रसोईया सुनीता देवी का बताना है कि 12 महीने काम करने के बाद भी हमें सिर्फ 10 महीने का ही मानदेय दिया जाता है। जिसे 12 महीने किया जाए और 10 हजार रुपया प्रति माह दिया जाए। इसको लेकर हम लोगों ने कई बार धरना-प्रदर्शन व आंदोलन भी किया है लेकिन बार-बार आश्वासन मिलने के बावजूद इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अगर जल्द ही हमारा मानदेय नहीं बढ़ाया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा और काम ठप कर दिया जाएगा। वहीं राजकीय उच्च विद्यालय विशनपुर की रसोईया शांति देवी ने बताया कि वह लोग निस्वार्थ भाव से काम कर रही है। लेकिन वेतन के लिये मोहताज होना पड़ता है। इस वर्ष मात्र सात महीने का ही वेतन मिला है। अभी भी तीन महीने का वेतन बाकी ही है।

60 से 65 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी :
मिड डे मील बनाने वाले रसोइया विद्यालयों में प्रधानाध्यापक का भारी दबाव महसूस करती हैं कि एक शैक्षणिक सत्र के बाद प्रधानाध्यापक उनकी जगह किसी अन्य महिला या पुरुष को न रख लें। इनका मानदेय वर्तमान में मात्र 1650 रुपये है। इस आधार पर उनका प्रतिदिन का मानदेय करीब 60 से 65 रुपए होगा। जो कि उनके दैनिक खर्च के हिसाब से काफी कम है। मात्र इतने पैसे में अपने घर के लिए साग, सब्जी एवं राशन की व्यवस्था नहीं कर सकतीं। फिर कपड़े, दवा व अन्य खर्च के लिए अपनी ज़रूरतें कैसे पूरी करती होंगी?
10 हजार रुपये वेतन करने समेत अन्य मांगे :
रसोईयों के द्वारा उनका वेतन तत्काल 10 हजार रुपये प्रति माह करने की मांग की गई है। वहीं साल में 12 महीने का मानदेय दिये जानें, रसोईया को सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिये जाने, ड्रेस में दो जोड़ी सूती साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट हर वर्ष दी जाने, तीन हजार रूपये पेंशन दी जाने, स्वास्थ्य बीमा दी जानें, रसोइया के साथ सम्मानजनक व्यवहार किये जानें, साथ ही रिक्त पदों पर रसोइयों की शीघ्र बहाली किये जाने और रिटायर व मृत रसोइया के परिवार को प्राथमिकता देते हुए अलग से लाभ दिये जाने की मांग की गई।

वेतन नहीं बढ़ा तो होगा आंदोलन :
बिहार राज्य मिड-डे मील वर्कर्स यूनियन के राज्य कार्यकारी अध्यक्ष मनोज गुप्ता ने कहा कि प्रदेश की रसोईया की मांग जायज है। उनकी मांगों को पूरा समर्थन दिया जाए। सरकार सिर्फ अपनी पीठ ठपथपाने में व्यस्त है। यदि रसोईया बहनों की न्यूनतम मासिक वेतन रुपये 10 हजार नहीं किया गया तो राजधानी की सड़कों पर आने वाले समय में एक बड़ा आंदोलन देखने को मिलेगा।

समस्या :
1. 1650 रूपये के मानदेय में परिवार का गुजारा करना बेहद मुश्किल है।
2. 12 महीने काम करने कि बावजूद हमें सिर्फ 10 महीने का ही मानदेय मिलता है।
3. आग व गैस पर खाना बनाते हैं, जो जोखिम भरा है। लेकिन कोई भी अप्रिय घटना हो जाने पर हमें स्वास्थ्य बीमा का लाभ नहीं दिया जाता है।
4. महिला रसोईयों को विशेषावकाश नहीं मिलता है।
5. रिटायर्मेंट के बाद एक कोई भी लाभ नहीं मिलता है।
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सुझाव :
1. मानदेय बढ़ाकर 10 हजार रूपये प्रति माह किया जाए।
2. 12 महीने का वेतन हमें भुगतान किया जाए।
3. स्वास्थ्य बीमा कराया जाए, और बीमार रहने की स्थिति में वेतन चालू रखा जाए।
4. विशेषावकाश समेत अन्य छुट्टी दिया जाए।
5. रिटायर्मेंट के बाद सरकारी लाभ मिले।

बिहार में रसोइया का मानदेय मात्र 1650 रूपये है, जिसमें कोई वृद्धि नहीं की गयी। जबकि तमिलनाडु, महाराष्ट्र, ओडिशा, हरियाणा सहित अन्य प्रदेश में हमसे बहुत अधिक मानदेय मिल रहा है। जितना मानदेय दिया जा रहा है, इस महंगाई में उससे गुजारा चलाना मुश्किल है। हमारी मांग है कि रसोइया को न्यूनतम मजदूरी गारंटी दी जाय और हर साल इसमें महंगाई भत्ता की वृद्धि की जाय। साथ ही मानदेय 10 हजार रूपये तत्काल की जाय।
– पूनम देवी, राजकीय माध्यमिक विद्यालय खोड़ी लगुनियाँ सुर्यकंठ
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बिहार में रसोईया की स्थिति बिल्कुल दयनीय है। हम लोग अपने बच्चों को भूखें छोड़कर स्कूल पहुंच छात्र-छात्राओं के लिये मीड-डे मिल पकाते हैं। केंद्र सरकार और राज्य सरकार के मजदूर विरोधी निति के कारण हम रसोईयों का मानदेय अब तक नहीं बढ़ाया गया है। 1650 रूपये के मानदेय मेघर चलाना मुश्किल हो गया है। हम लोग अब तक इसी उम्मीद से काम कर रहे हैं की हमारा मानदेय बढ़ाया जाएगा। लेकिन सरकार की ओर से मानदेय बढ़ाने को लेकर अब तक कोई पहन नहीं की गई है।
– अरूण कुमार, प्राथमिक विद्यालय कन्या तिसवारा मोरवा
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सरकार कहती है कि हमारे मानदेय बढ़ाने को लेकर राजकोष में अभी पैसें नहीं है लेकिन अन्य कामों के लिये बेफिजुल का खर्च किया जा रहा है। मात्र 1650 रूपये हमलोगों को मानदेय दिया जा रहा है जिसमें परिवार चलाना बेहद मुश्किल है। एक मजदूर भी मजदूरी करके हमसे अधिक पैसे कमा लेता है।
– मानती देवी, उत्क्रमित मध्य विद्यालय मुसापुर
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हमलोगों के लिये छुट्टी का प्रावधान नहीं है। महिला को हर विभाग में दो दिनों का विशेषावकाश मिलता है लेकिन हम लोगों के यह नियम नहीं है। सभी विभागों में जब छुट्टी का प्रावधान है तो हम महिला रसोईयों को भी विशेषावकाश मिलना चाहिए।
– जलेश्वरी देवी, प्राथमिक विद्यालय जितवारपुर निजामत यादव टोल
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हमें जितना मानदेय दिया जा रहा है, इस महंगाई में उससे गुजारा चलाना मुश्किल है। हमारी मांग है कि रसोइया को न्यूनतम मजदूरी गारंटी दी जाय और हर साल इसमें महंगाई भत्ता की वृद्धि की जाय। इसके साथ ही मानदेय 10 हजार रूपये तत्काल की जाय। इसके निजीकरण को रोका जाय, साल में 12 महीने का मानदेय दिया जाए, रसोईया को सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाये। केरल में हर रोज 650 रूपये के हिसाब से रसोईया को मिलता है। वहीं कर्नाटक में पांच हजार, तमिलनाडु में साढ़े तीन हजार, वहीं अपने बगल के ही राज्य झारखंड में भी साढ़े तीन हजार रुपये मिलता है लेकिन बिहार में मात्र 1650 रूपये मिल रहा है।
– राजेश्वर कुमार सिंह, प्राथमिक विद्यालय सोमनाहा कल्याणपुर
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हम लोग स्कूल में सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक रहते है। खाना बनाने से लेकर बर्तन साफ, झारू-पोछा लगाना से लेकर हर छोटा-बड़ा काम करते हैं लेकिन इसके बावजूद हमारा मानदेय 1650 रूपया ही है जो बेहद खेदजनक है। हम लोग गरीब तबके के बेहद कम पढ़े लिखे लोग है इसका मतलब यह नहीं है की हमें एक मजदूर से भी काफी कम पैसे दिये जाए। हमें बार-बार हटाने की धमकी भी दी जाती है। हम लोगों का परिवार है लेकिन इतने खम पैसों में परिवार चलाना काफी मुश्किल है। घर के दूसरे लोग मजदूरी करते हैं तो घर की रोजी-रोटी किसी तरह चल पाती है।
– मंजू कुमारी, राजकीय माध्यमिक विद्यालय कोरबद्दा लगुनियाँ सूर्यकंठ
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12 महीने काम करने के बाद भी हमें सिर्फ 10 महीने का ही मानदेय दिया जाता है। जिसे 12 महीने किया जाए और 10 हजार रुपया प्रति माह दिया जाए। इसको लेकर हम लोगों ने कई बार धरना-प्रदर्शन व आंदोलन भी किया है लेकिन बार-बार आश्वासन मिलने के बावजूद इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अगर जल्द ही हमारा मानदेय नहीं बढ़ाया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा और काम ठप कर दिया जाएगा।
– सुनीता देवी, राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय लगुनियाँ सूर्यकंठ
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हमलोग निस्वार्थ भाव से काम कर रही है। लेकिन वेतन के लिये मोहताज होना पड़ता है। इस वर्ष मात्र सात महीने का ही वेतन मिला है। अभी भी तीन महीने का वेतन बाकी ही है।
– शांति देवी, राजकीय उच्च विद्यालय विशनपुर
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क्या बोले संबंधित अधिकारी :
रसोईया संघ के द्वारा जो मांग की गयी है वह मेरे द्वारा निदेशक मध्याह्न भोजन योजना को प्रेशित की जा चुकी है। निदेशालय स्तर से जो आदेश होगा उसके अनुरूप ही हम चलेंगे। बाकी उनका मानदेय जिस तारीख को निदेशालय से आता है उसी दिन या उसके अगले दिन तक उनके खाते में भेज दिया जाता है।
– सुमित सौरव, डीपीओ, मध्याह्न भोजन योजना, समस्तीपुर
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क्या बोले संघ के नेता :
रसोईयों की मांग जायज है, संघ के द्वारा उनकी मांगों को पूरा समर्थन दिया जा रहा है। सरकार सिर्फ झूठे वादों पर अपनी पीठ ठपथपाने में व्यस्त है। यदि रसोईया बहनों की न्यूनतम मासिक वेतन रुपये 10 हजार नहीं किया गया तो राजधानी की सड़कों पर आने वाले समय में एक बड़ा आंदोलन देखने को मिलेगा। रसोईयों का कहीं जाति के आधार पर तो कहीं लैंगिक के आधार पर शोषण होता है, इस पर सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है। बजट सत्र से पहले हमलोग मानदेय बढ़ाने को लेकर लड़ाई लड़ेंगे। अगर इस बजट सत्र में मानदेय नहीं बढ़ाया गया तो रसोईया संघ हड़ताल पर चला जाएगा।
– मनोज गुप्ता, राज्य कार्यकारी अध्यक्ष, बिहार राज्य मिड-डे मील वर्कर्स यूनियन
