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जब चारा घोटाले ने छीन ली थी लालू यादव की कुर्सी, राबड़ी बन गईं CM; 1995 में पहली बार कांग्रेस तीसरे स्थान पर खिसकी

बिहार विधानसभा का 1995 का चुनाव कई मायने में ऐतिहासिक रहा। इस चुनाव में लालू प्रसाद की करिश्माई छवि चरम पर थी। उन्होंने न केवल राजनीतिक विरोधियों को पराजित किया, बल्कि पार्टी के अंदर भी विरोधियों को पटखनी दी। उन्होंने जनता दल को सफलता के शीर्ष पर पहुंचा दिया। उनके नेतृत्व में जनता दल ने शानदार सफलता पायी व लालू प्रसाद की सत्ता में वापसी हुई। 11 वीं विधानसभा कई कारणों से हमेशा याद रहेगी। इसपर चारा घोटाले का साया मंडराया।

इसके कारण लालू प्रसाद की कुर्सी गयी, राबड़ी देवी का अचानक सीएम बनना इस समय की सबसे महत्वपूर्ण घटना रही। यही नहीं लालू प्रसाद से अलग होकर नीतीश कुमार ने नयी राह चुनी। समता पार्टी का गठन हुआ। नीतीश कुमार बिहार में पार्टी के नेता बने। भारतीय जनता पार्टी धीरे-धीरे अपनी ताकत बढ़ाती गयी। इस बार भी उसने अपेक्षित सफलता प्राप्त की। कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए वह सूबे की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गयी। पहली बार कांग्रेस तीसरे स्थान पर पहुंच गयी।

उधर, जनता दल में अंतर्विरोध चरम पर पहुंच गया। कांग्रेस समेत अन्य दलों में भी गुटबाजी बढ़ी। झारखंड मुक्ति मोर्चा पहले ही टूट चुका था। यूपी आधार वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी ने चुनाव में दो-दो सीटें जीतकर सफलता हासिल की। कांग्रेस ने अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन किया। पिछले चुनाव में ही सबकुछ गंवा चुकी कांग्रेस को इस चुनाव में और बड़ा झटका लगा। वह केवल 29 सीटें जीत पायी। उसे पिछली बार से 42 सीटें कम मिलीं।

लालू के नेतृत्व में जनता दल ने 167 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी। पिछली बार उसे 122 सीटें ही मिली थी और अन्य दलों के सहयोग से सरकार बनानी पड़ी थी। लेकिन इस बार वह अकेले बहुमत में आ गया। उधर, 41 सीट जीतकर भाजपा सबसे बड़ा विपक्षी दल बनकर उभरी। उसके नेता यशवंत सिन्हा को विपक्ष का नेता बनाया गया। हालांकि वे एक साल से भी कम समय तक इस पद पर रहे। 1996 में सुशील कुमार मोदी विपक्ष के नेता बने। वे भाजपा में बड़ी तेजी से उभर रहे थे।

136 विधायक चले गए लालू के साथ

1990 से लगातार विधानसभा का चुनाव जीत रहे बिजेन्द्र यादव कहते हैं कि 1995 में जनता दल ने शानदार जीत हासिल की। लालू प्रसाद जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना चाहते थे, लेकिन शरद यादव से मात खा गए। उधर, चारा घोटाले के कारण जब लालू प्रसाद की कुर्सी जाने लगी तो उन्होंने पार्टी तोड़ दी और राष्ट्रीय जनता दल बना लिया। शरद यादव के साथ जनता दल में 31 विधायक ही रह गए। शेष 136 विधायक लालू के साथ चले गए। उन्होंने कांग्रेस व अन्य दलों के साथ निर्दलीयों के सहयोग से सरकार बचा ली। अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सीएम बनाकर परोक्ष रूप से खुद सरकार चलाने लगे।

सत्ता बचाने को लालू ने जनता दल तोड़ राजद बनाया

लालू प्रसाद को इसमें फंसता देख, पार्टी आलाकमान ने उनपर कुर्सी छोड़ने का दबाव बनाया। लालू प्रसाद इसके लिए तैयार नहीं थे। दबाव बढ़ा तो लालू प्रसाद ने जनता दल ही तोड़ दिया और राष्ट्रीय जनता दल के नाम से 5 जुलाई को अपनी पार्टी बना ली। अब वे खुद ही आलाकमान थे। इस प्रकार उनकी कुर्सी बच गयी। पर जैसे-जैसे जांच बढ़ी, उनकी राह कठिन होने लगी। चार्जशीट दायर होने के बाद उनके जेल जाने की नौबत आ गयी।

लालू ने इससे बचने के लिए पत्नी राबड़ी देवी को 25 जुलाई 1997 को कुर्सी सौंप दी और 30 को कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया। राबड़ी मुख्यमंत्री के रूप में सरकार चलाने लगीं। लालू प्रसाद तोड़-फोड़ में माहिर थे। उन्होंने 1990 में भी सरकार बनाने और उसे चलाने में कई दलों में तोड़-फोड़ की थी। इस दौरान राबड़ी देवी के दो भाई साधु यादव व सुभाष यादव सत्ता के दो बड़े सितारे बनकर उभरे। हाल यह हो गया कि वे दोनों ही सत्ता के महत्वपूर्ण केन्द्र बन गए। इसका प्रतिकूल प्रभाव सरकार की इमेज पर पड़ने लगा था।

चारा घोटाले के बाद राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदला

लालू प्रसाद मस्ती में सरकार चला रहे थे। हालांकि एक साल में ही 1996 में चारा घोटाले का साया उनके ऊपर मंडराने लगा। इसके बाद राज्य का राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदला। तत्कालीन वित्त सचिव वीएस दूबे की पहल पर राज्य सरकार के खजाने की लूट की जांच की आंच लालू प्रसाद तक पहुंची। स्थानीय डीसी अमित खरे द्वारा चाईबासी ट्रेजरी से करोड़ों की अवैध निकासी का मामला पकड़े जाने के बाद उसके तार ऊपर तक जुड़ने लगे। हाईकोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया। जांच के तार लालू प्रसाद से जुड़ने लगे।

Avinash Roy

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