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बिहार के सियासी रण में ढलान पर बाहुबलियों का दबदबा, जानिए कैसे घटता गया सत्ता का ग्राफ…

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सियासत में बाहुबलियों का अपना दबदबा रहा है। देश में आपातकाल के पहले तक जो पर्दे के पीछे से विभिन्न दलों के नेताओं को विधानसभा या संसद पहुंचाने में मददगार होते थे, वे 1977 से खुलकर खुद चुनावी मैदान में उतरने लगे। ऐसे लोग स्थानीय ही नहीं, क्षेत्रीय राजनीति में भी दखल रखने लगे। 2000 के दशक तक विभिन्न राज्यों में विधानसभाओं और संसद में इनकी उपस्थिति बढ़ती रही। हालांकि अब ऐसी छवि रखने वालों का सियासी रण में असर ढलान पर है।

बिहार में बाहुबल की सियासत ढलान पर है। एक दौर था जब राज्य के चुनावी अखाड़े के ऐसे लड़ाकों की गूंज पूरे देश में सुनाई देती थी। अलग-अलग इलाकों में समानांतर हुकूमत चलाने वाले इन बाहुबलियों का अपना रुतबा था। राजनीतिक दल भी इनकी अनदेखी करने का साहस नहीं जुटा पाते थे। वजह थी इनका प्रभाव क्षेत्र। नेपथ्य से दिग्गजों की जीत सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाने वाले अनेक बाहुबलियों ने जब खुद राजनीति में कदम रखा तो एक के बाद एक सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले गये।

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लेकिन, जिस तेजी से इनका उदय हुआ, उसी तरह ये धीरे-धीरे वैधानिक सत्ता की सख्ती में कमजोर पड़ते गए और इनका ग्राफ गिरने लगा है। इसबार जो कुछ चुनाव में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अखाड़े में हैं भी तो इनका अंदाज जुदा है। ये अपने बाहुबल पर नहीं, अपनी सियासी पहचान पर वोट मांग रहे हैं। कोई जनता को प्रणाम करने का अभियान चला रहे तो ज्यादातर लोगों की सेवा करने की कसमें खा रहे हैं।

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कोई इलाके का बादशाह तो कोई रॉबिन हुड बिहार की सियासत में चमके बाहुबलियों की अपराध गाथा और उनका खौफ भी समय के साथ बड़ा होता गया। अपने-अपने इलाकों में इन्होंने अपनी बादशाहत कायम कर ली थी। किसी की रॉबिनहुड की तो किसी ने गरीबों के मसीहा के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। स्कूलों में शिक्षक इनके डर से समय पर पहुंचे। डॉक्टरों की फीस तक इन्होंने तय की। अपने इलाके में इनका समानांतर शासन चला। हालांकि इनके निशाने पर ज्यादातर उच्च तथा धनाढ्य वर्ग रहा।

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सन् 1970 के दशक में हुआ बाहुबल का प्रवेश बिहार की सियासत में बाहुबलियों का प्रवेश पिछली सदी के 70 के दशक से हुआ। हालांकि उसके बाद अगले 35 वर्षों तक हर दशक में इनका प्रभाव बढ़ता चला गया। जानकार वीर महोबिया की सियासी पारी को राजनीति में बाहुबल का प्रवेश बिंदु मानते हैं। उस समय हाथी पर चलने वाले महोबिया वैशाली में आतंक के पर्याय थे। वीरेन्द्र सिंह उर्फ वीर महोबिया ने 1980 में चुनाव लड़ा, लेकिन पांचवें स्थान पर रहे।

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अगले चुनाव में उन्होंने ‘वीर महोबिया क्राम-क्राम, वैशाली में धड़ाम-धड़ाम’ के नारे की मुनादी कराई। कहा कि चुनाव जीते तो सदन में रहेंगे, नहीं जीते तो क्षेत्र में रहना होगा और इसका दुष्परिणाम तो लोगों को ही झेलना होगा। परिणाम यह हुआ कि 1985 में जन्दाहा से विधानसभा का चुनाव जीतकर उन्होंने तहलका मचा दिया। दसों अंगुलियों में सोने की अंगूठी पहनने वाले महोबिया ने अपनी बेटी की शादी में जहाज से फूलों की बारिश करवायी।

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70 से 80 के दशक में विधानसभा में 25 से अधिक बाहुबली पहुंचे। 1980-85 के बाद तो चुनाव लड़ने का सिलसिला ही चल पड़ा। मोकामा में अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह ने 1990 में कांग्रेसी उम्मीदवार को हरा दिया। फिर 1995 में वे भी जीते। 2000 में बाहुबली सूरजभान के हाथों हार झेलनी पड़ी। बाद में यहां से दिलीप सिंह के भाई अनंत सिंह लगातार जीतते रहे। प्रभुनाथ सिंह 1998 में महाराजगंज से सांसद बने। फिलहाल जेल में हैं। रामा सिंह पांच बार विधायक बने और 2014 में वैशाली से सांसद बने। 90 के दशक में लोकसभा में बिहार से आधे दर्जन बाहुबलियों की उपस्थिति रही। इनका प्रभाव 2010 तक रहा। इसके बाद इनकी राजनीति का सूर्यास्त होने लगा।

बाहुबली सूरजभान, रामा सिंह, अजय सिंह खामोश हैं। अनंत सिंह, सुनील पांडेय, रणवीर यादव, प्रभुनाथ सिंह, राजन तिवारी, ददन यादव जैसे बाहुबली इस बार सियासी संग्राम के पर्दे से गायब हैं। बाहुबली शहाबुद्दीन 1990 में पहली बर जीतकर विधानसभा पहुंचे। 1996 से 2009 तक सांसद रहे। आनंद मोहन ने 1996-98 में शिवहर से लोकसभा चुनाव जीता। गोपालगंज डीएम की हत्या में जेल गए तो मूल दृश्य से बाहर हो गए। उनकी पत्नी लवली आनंद ने वैशाली से 1994 में चुनाव जीता। इसके बाद लवली को लगातार हार झेलनी पड़ी और ये दंगल से बाहर हो गई। इस बार जदयू ने टिकट दिया है। पप्पू यादव और उनकी पत्नी को 2019 में हार मिली, 2014 में प्रभुनाथ सिंह को जबकि उनके पुत्र को 2019 में महाराजगंज में हार मिली। बाद में यह फेहरिस्त लंबी होती गयी।

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पिछले लोस चुनाव में तीन बाहुबलियों के परिजनों को जीत मिली। स्व. बृजबिहारी की पत्नी रमा देवी (भाजपा) शिवहर से, अजय सिंह की पत्नी कविता सिंह (जदयू) सीवान से, सूरजभान के भाई चंदन सिंह (लोजपा) नवादा से सांसद बने। 2014 में रमा देवी के अलावा बाहुबली पप्पू यादव (राजद) मधेपुरा से, उनकी पत्नी रंजीत रंजन (कांग्रेस) को सुपौल से जीत मिली। सूरजभान की पत्नी वीण देवी (लोजपा) मुंगेर से और रामा सिंह (लोजपा) से वैशाली से चुनाव जीते।

पांच बार के सांसद पप्पू यादव पूर्णिया से निर्दलीय मैदान में हैं जबकि वैशाली से बाहुबली मुन्ना शुक्ला राजद से प्रत्याशी हैं। नवादा से बाहुबली अशोक महतो की पत्नी अनिता देवी और पूर्णिया से अवधेश मंडल की पत्नी बीमा भारती राजद की प्रत्याशी हैं। सुरेन्द्र यादव भी जहानाबाद से राजद के प्रत्याशी हैं। शिवहर से बाहुबली आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद को जदयू ने उतारा है।

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