राम विलास पासवान (Ram Vilas Paswan) की विरासत की राजनीति कर रहे उनके बेटे चिराग पासवान (Chirag Paswan) एवं भाई पशुपति कुमार पारस (Pashupati Kumar Paras) अब एक साथ आएंगे। भारतीय जनता पार्टी (BJP) इसके लिए दोनों पर दबाव बना रही है। लक्ष्य बिहार में अकेले पड़ चुकी बीजेपी को लोकसभा चुनाव (Lok Shabha Election 2024) के पहले दलित वोटों (Dalit Vote Bank) का सहारा देने का है। ऐसा एक-दूसरे के विरोधी लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के दोनों धड़ों को साथ लाकर ही हो सकता है।
सूत्रों के अनुसार बीजेपी चिराग पासवान को साथ लाने की कोशिश कर रही है। उनके चाचा पशुपति कुमार पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) पहले से एनडीए में हैं। पशुपति पारस केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार (Narendra Modi Government) में मंत्री भी हैं। चिराग पासवान ने पारस के मंत्री तथा एनडीए में रहने तक बीजेपी से बातचीत से इनकार किया था, लेकिन बदली परिस्थितियों में बीजेपी चिराग व पारस को एक साथ लाने का फार्मूला खोज रही है।
बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) का जनता दल यूनाइटेड (JDU) अब एनडीए से अलग होकर महागठबंधन (Mahagathbandhan) का घटक दल है। उसके साथ दो बड़े दलित चेहरे हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) के जीतन राम मांझी (Jitan Ram ManjhI) एवं विकासशील इनसान पार्टी (VIP) के मुकेश सहनी (Mukesh Sahani) भी एनडीए का साथ छोड़कर अब महागठबंघन में हैं।
बिहार में दलित वोट कई जगह निर्णायक हैसियत में हैं। बीजेपी इसकी भरपाई के लिए एलजेपी के वोट बैंक के बिखराव को रोकना चाहती है। उसकी नजर बिहार के छह प्रतिशत पासवान मतदाताओं पर है, जिन्होंने पिछले चुनाव में रामविलास पासवान के प्रति आस्था प्रकट की थी।
बीजेपी लोकसभा चुनाव में जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों के महागठबंधन से जंग में दलित मतदाताओं के महत्व को समझ रही है। वह समझ रही है कि भले ही पशुपति पारस का एलजेपी गुट एनडीए में है, लेकिन बिहार में पासवान मतदाताओं पर पकड़ चिराग पासवान की है। ऐसे में एनडीए में चिराग पासवान को लाना बीजेपी की जरूरत भी है। ऐसे में बीजेपी पारस व चिराग को एनडीए में साथ लाने के फार्मूले पर मंथन कर रही है।
2024 के लोकसभा चुनाव के पहले चिराग पासवान को भी कोई गठबंधन चाहिए। जेडीयू के महागठबंधन में आने के कारण वहां उनके लिए जगह नहीं है। पशुपति कुमार पारस भी किसी भी कीमत पर महागठबंघन में जाने से इनकार कर चुके हैं। चिराग खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताते रहे हैं। बीते बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने जेडीयू का विरोध तो बीजेपी का समर्थन किया था। बीजेपी चाहती है कि उसके दोनों समर्थक लोकसभा चुनाव से पहले एक साथ एनडीए में आ जाएं।
खास बात यह भी है कि बीजेपी के कई नेता चिराग पासवान को एनडीए का हिस्सा बताते रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव के दौरान केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने भी चिराग पासवान को फोन कर द्रौपदी मुर्मू के लिए उनका समर्थन मांगा था। चिराग पासवान राष्ट्रपति चुनाव को लेकर हुई एनडीए की बैठक में भी शामिल हुए थे। हालांकि, चिराग ने खुद को एनडीए से बाहर बताते हुए कहा था कि वे बैठक में राष्ट्रपति चुनाव में द्रोपदी मुर्मू को समर्थन देने के कारण शामिल हुए थे।
चिराग पासवान को साथ लाने के लिए बीजेपी की कोशिश की पहली झलक कुछ दिनों पहले सूरत में आयोजित हिंदी दिवस समारोह में दिखा था। कार्यक्रम में वे अमित शाह के साथ मंच पर थे। कहा गया कि वे ‘राजभाषा’ पर संसदीय समिति के सदस्य के रूप में वहां थे, लेकिन सूत्रों की मानें तो इस मुलाकात में बिहार की राजनीति पर भी बातें हुईं।
बहरहाल, बीजेपी के प्रयास जारी हैं। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले चाचा पशुपति कुमार पारस और भतीजा चिराग पासवान एक छतरी के नीचे आ जाएं। वैसे, चिराग पासवान ने अभी तक ऐसी किसी संभावना पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
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