Bihar

महिलाओं का करियर खत्म हो जाएगा, कोई नौकरी भी नहीं देगा; पीरियड्स लीव की याचिका पर सुनवाई से SC का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया, जिसमें कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए देशव्यापी ‘मासिक धर्म अवकाश’ (Menstrual Leave) लागू करने की नीति बनाने की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर इस तरह का प्रावधान कानूनन लागू कर दिया गया, तो कंपनियां महिलाओं को नौकरी देने से कतराएंगी और इससे अनजाने में महिलाओं के प्रति लैंगिक रूढ़िवादिता को ही बढ़ावा मिलेगा।

हालांकि, अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए यह स्पष्ट किया कि सरकार और संबंधित अधिकारी इस मामले में सभी हितधारकों से परामर्श करके नीति बनाने की संभावना पर विचार कर सकते हैं।

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ कर रही थी। पीठ ने टिप्पणी की करते हुए कहा- ये याचिकाएं महिलाओं को कमतर आंकने और यह जताने के लिए होती हैं कि मासिक धर्म उनके साथ होने वाली कोई बुरी चीज है… यह एक सकारात्मक अधिकार है… लेकिन उस नियोक्ता के बारे में भी सोचिए जिसे इसके लिए वैतनिक अवकाश (Paid Leave) देना होगा।

नौकरियों पर असर की चिंता

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कानून के जरिए मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य बनाने के सामाजिक और पेशेवर परिणामों पर गहरी चिंता जताई। पीठ ने कहा कि इस तरह के कदमों से कार्यस्थल पर महिलाओं की छवि और उनके पेशेवर विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

करियर खत्म हो जाएगा

अदालत ने कहा- स्वैच्छिक रूप से (अपनी मर्जी से) छुट्टी देना बहुत अच्छा है। लेकिन जैसे ही आप कहते हैं कि यह कानूनन अनिवार्य है, तो कोई उन्हें नौकरी नहीं देगा। कोई भी उन्हें न्यायपालिका या सरकारी नौकरियों में नहीं रखेगा; उनका करियर खत्म हो जाएगा।

याचिकाकर्ता की दलीलें

यह जनहित याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर की गई थी। उनकी ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने अदालत को बताया कि कुछ राज्यों और संस्थानों ने पहले ही इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाए हैं। उन्होंने केरल का उदाहरण दिया, जहां स्कूलों में छात्राओं को इस दौरान रियायत दी गई है। उन्होंने यह भी बताया कि कई निजी कंपनियां अपनी मर्जी से अपनी महिला कर्मचारियों को यह छुट्टी दे रही हैं। इस पर सीजेआई ने सहमति जताते हुए कहा कि कंपनियों द्वारा अपनी मर्जी से ऐसी नीतियां बनाना स्वागत योग्य है, लेकिन इसे कानून बनाकर थोपने से नुकसान हो सकता है।

सरकार और अधिकारियों को निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस बात पर गौर किया कि वे पहले ही संबंधित अधिकारियों को अपना प्रतिवेदन (ज्ञापन) दे चुके हैं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के लिए बार-बार परमादेश की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाना जरूरी नहीं है। पीठ ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे इस ज्ञापन पर उचित निर्णय लें और संबंधित पक्षों से बातचीत करके नीति बनाने पर विचार करें।

Avinash Roy

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