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नीतीश को CM बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले कुर्मी चेतना महारैली के संयोजक सतीश कुमार का निधन, निशांत कुमार ने दी श्रद्धांजलि

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बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूर्व विधायक और कुर्मी चेतना महारैली के संयोजक सतीश कुमार का निधन हो गया है। उनके निधन से राज्य के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर है। सतीश कुमार को उन नेताओं में गिना जाता है जिन्होंने बिहार की राजनीति में सामाजिक चेतना और पिछड़े वर्गों की भागीदारी को मजबूत करने के लिए लगातार संघर्ष किया। खास तौर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक उभार में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

सतीश कुमार के निधन की खबर मिलते ही कई राजनीतिक और सामाजिक नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार भी उनके आवास कंकड़बाग, पटना पहुंचे। निशांत कुमार ने सतीश कुमार के पार्थिव शरीर पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए और उनके पुत्र तथा अन्य परिजनों से मिलकर अपनी संवेदना प्रकट की। इस दौरान उन्होंने कहा कि सतीश कुमार का राजनीतिक और सामाजिक योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।

सतीश कुमार बिहार के शेखपुरा जिले के बरबीघा प्रखंड के सर्वा गांव के निवासी थे। उनका जन्म वर्ष 1948 में हुआ था। वे लंबे समय तक सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े रहे। अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने पिछड़े और वंचित समाज के अधिकारों की आवाज बुलंद की। यही कारण है कि उन्हें सामाजिक चेतना को जगाने वाले नेताओं में भी गिना जाता था।

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सतीश कुमार की पहचान पूरे बिहार में वर्ष 1994 में आयोजित ऐतिहासिक कुर्मी चेतना महारैली के बाद और अधिक मजबूत हुई। 12 फरवरी 1994 को पटना के गांधी मैदान में आयोजित इस विशाल और अनुशासित रैली का आयोजन उन्होंने ही किया था। इस रैली का मुख्य उद्देश्य कुर्मी समाज की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना और सामाजिक चेतना को मजबूत करना था। उस समय इस रैली ने बिहार की राजनीति में बड़ा संदेश दिया था। इस आयोजन के माध्यम से कुर्मी, कोइरी और अतिपिछड़ा समाज को एक मंच पर लाने का प्रयास किया गया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस रैली के बाद ही राज्य की राजनीति में सामाजिक समीकरणों में बड़ा बदलाव देखने को मिला।

सतीश कुमार का राजनीतिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत शेखपुरा से तत्कालीन विधायक राजो सिंह के खिलाफ चुनाव लड़कर की थी। इसके बाद उन्होंने लगातार राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 1990 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर पहली बार बिहार विधानसभा पहुंचे। यह उनकी राजनीतिक यात्रा की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

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इसके बाद वर्ष 1995 में उन्होंने अस्थावां विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। बाद में वर्ष 2001 में वे समता पार्टी के टिकट पर भी अस्थावां से विधायक चुने गए। समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में भी उनका नाम शामिल रहा। यही वजह है कि उन्हें पार्टी के शुरुआती दौर के महत्वपूर्ण नेताओं में गिना जाता था।

राजनीति में सक्रिय रहते हुए सतीश कुमार ने वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव भी लड़ा। उन्होंने नालंदा लोकसभा सीट से लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरकर अपनी किस्मत आजमाई थी। हालांकि इस चुनाव में उन्हें जीत नहीं मिली, लेकिन वे दूसरे स्थान पर रहे थे, जो उनके मजबूत जनाधार को दर्शाता है।

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सतीश कुमार को एक जुझारू और सिद्धांतवादी नेता के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी के लिए संघर्ष करते हुए बिताया। उनके निधन से बिहार की राजनीति में एक ऐसे नेता की कमी महसूस की जा रही है जिसने समाज के कमजोर वर्गों की आवाज को मजबूत करने का प्रयास किया।उनके निधन पर कई राजनीतिक दलों के नेताओं और सामाजिक संगठनों ने भी शोक व्यक्त किया है। सभी ने कहा कि सतीश कुमार का योगदान बिहार की राजनीति और समाज के लिए हमेशा यादगार रहेगा।

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