बिहार की सड़कों की तस्वीर अब पूरी तरह बदलने वाली है. राज्य सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए खुद का ‘स्टेट हाईवे अधिनियम’ बनाने की तैयारी शुरू कर दी है. इस कानून के बनने के बाद बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की फेहरिस्त में शामिल हो जाएगा, जो अपनी ओर से एक्सप्रेस-वे का निर्माण और संचालन करते हैं. अब तक बिहार में केवल नेशनल हाईवे (NH) के ही कानून प्रभावी थे, लेकिन नए एक्ट के आने के बाद राज्य सरकार सात निश्चय-3 के तहत प्रस्तावित 5 बड़े एक्सप्रेस-वे के निर्माण का रास्ता साफ कर देगी.
विभागीय सचिव पंकज कुमार पाल के नेतृत्व में अधिकारियों की टीम ने हाल ही में महाराष्ट्र का दौरा किया, जहां उन्होंने एक्सप्रेस-वे के मॉडल का अध्ययन किया. नए अधिनियम के तहत बिहार में एक स्वतंत्र ‘एक्सप्रेस-वे प्राधिकार’ बनाने पर विचार चल रहा है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि राज्य सरकार पर कोई वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा और निजी भागीदारी से सड़कों का जाल बिछाया जा सकेगा. इतना ही नहीं, हाइब्रिड एन्यूटी मोड में बनने वाली इन सड़कों से टोल वसूली की नीति भी इसी कानून के दायरे में होगी.
नए कानून में स्टेट हाईवे (SH) घोषित करने के कड़े मानक तय किए जा रहे हैं. अब उन्हीं सड़कों को एसएच का दर्जा मिलेगा जो कम से कम दो नेशनल हाईवे को जोड़ती हों या राज्य के किसी प्रमुख शहर को राजधानी पटना से कनेक्ट करती हों. पर्यटन स्थलों और महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्रों तक जाने वाली सड़कों को भी इस श्रेणी में रखा जाएगा. इन सड़कों की चौड़ाई कम से कम 7.5 मीटर (दो लेन) अनिवार्य होगी, जबकि भविष्य के विस्तार के लिए 30 से 60 मीटर तक अतिरिक्त जमीन अधिग्रहित की जाएगी.
बिहार सरकार का मकसद केवल गाड़ियों की रफ्तार बढ़ाना नहीं, बल्कि नए औद्योगिक क्षेत्रों को बेहतर कनेक्टिविटी देना है. एक्सप्रेस-वे सामान्य सड़कों से ऊंचे होंगे और इन पर गाड़ियां 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकेंगी. आमतौर पर ये एक्सप्रेस-वे 6 या 8 लेन के होंगे. उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों की तर्ज पर बिहार भी अब अपनी सड़कों के जरिए विकास की नई इबारत लिखने को तैयार है.
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