बिहार की राजनीति के दो बड़े चेहरे मुख्यमंत्री व जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के अध्यक्ष नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने अपना पहला चुनाव छात्र जीवन में लड़ा था। मगर एक को हार मिली थी, तो दूसरे को जीत। जानिए वो कौन लोग थे, जिन्होंने बिहार के फुलवरिया और बख्तियारपुर से पटना पढ़ने आए नौजवानों को राजनीति में एंट्री दिलाने में मदद की? एक नौजवान तो हार से इतना निराश हुआ कि राजनीति को अलविदा कहकर क्लर्क की नौकरी पकड़ ली, लेकिन फिर कैसे हो गई वापसी?
सबसे पहले बात लालू यादव की। फुलवरिया से आए लालू को पटना विश्वविद्यालय के बीएन कॉलेज में प्रवेश मिला। तब तक यह जगह छात्र राजनीति का गढ़ बन चुकी थी। लालू लोहिया की समाजवादी धारा में बहने लगे। जमुई वाले सोशलिस्ट नेता श्रीकृष्ण सिंह के बेटे नरेंद्र सिंह पटना विश्वविद्यालय में सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता के तौर पर मशहूर थे। नरेंद्र ही वह शख्स थे, जिन्होंने लालू को छात्र राजनीति में एंट्री दिलाने में मदद की। उन्होंने लालू को सोशलिस्ट पार्टी की छात्र शाखा में नियुक्त कर दिया।
साल 1970 में लालू ने सोशलिस्ट पार्टी के लिए पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार से हार गए। हार से निराश लालू ने राजनीति को छोड़ने का मन बनाया और नौकरी पाने की कोशिश में जुट गए। जल्द ही कामयाबी मिली। उन्होंने पटना पशु चिकित्सालय में एक क्लर्क की नौकरी पा ली। लेकिन, कुछ समय बाद ही लालू राजनीति में लौट आए। फिर दोबारा पटना लॉ कॉलेज में पिछली डेट से एडमिशन लेकर यूनिवर्सिटी छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव लड़े और दूसरी बार में जीत गए।
अब बात करते हैं नीतीश कुमार की। बिहार के बख्तियारपुर का भोला-भाला मगर पढ़ने-लिखने में होशियार बच्चा, 1960 के दशक में स्कॉलरशिप पाकर इंजीनियर बनने पटना आ गया था। नीतीश कुमार का दाखिला बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में इलेक्ट्रिकल शाखा में हुआ था। यहीं आकर नितीश कुमार का छात्र राजनीति में प्रवेश हुआ। हालांकि राजनीति की बारीकियां, वह अपने पिता की राजनीतिक महफिलों से समझकर आए थे।
बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज में उन दिनों कांग्रेस विरोधी लहर थी। नीतीश के मित्र सुरेश शेखर, अरुण सिन्हा और नरेंद्र सिंह उन्हें छात्र राजनीति में ले आए। उन्होंने बिहार अभियंत्रण महाविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा। उनके दोस्तों ने उनका जमकर प्रचार किया। कांग्रेस विरोधी लहर के चलते उनकी जीत हो गई और वो अपना पहला चुनाव जीतकर कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष बन गए।
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