पुरानी कहावत है आम के आम, गुठली के दाम। बिहार की रसीली व स्वादिष्ट शाही लीची के बारे में यह बात सच होती दिख रही है। बताया जा रहा है कि लीची का छिलका भी बड़े काम होता है। भारत में लीची के सबसे बड़ी उत्पादक राज्य बिहार है। लेकिन राज्य में हजारों टन छिलका हर वर्ष कचरे में फेंक दिया जाता है। बिहार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, बीएयू के वैज्ञानिकों के प्रयास से इन छिलकों को अब फेंकने की जरूरत नहीं होगी। इसकी भी अच्छी कीमत मिलेगी। छिलके के रंग से दूसरे खाद्य पदार्थों को न सिर्फ पौष्टिक बनाया जा सकेगा, बल्कि लीची का रंग देकर खूबसूरत भी बनाया जा सकेगा।
यूनिवर्सिटी के खाद्य विज्ञान फसलोत्तर प्रौद्योगिकी विभाग में इस पर शोध शुरू हो गया है। वैज्ञानिकों ने बताया कि लीची के छिलके के लाल रंग में एंथोसायनिन पाया जाता है, जिसमें काफी मात्र में पोषक तत्व और एंटी ऑक्सिडेंट होते हैं। इस रंग को निकाल कर दूसरे खाद्य पदार्थों जैसे जूस, केक, आइसक्रीम, कैंडी आदि में मिलाया जा सकता है। लीची का रंग मिलाने से उसकी पौष्टिकता बढ़ाने के साथ उसके रंग को भी खूबसूरत बनाया जा सकेगा। इस पर शोध जारी है।
बताया जा रहा है कि लीची से निकले रंग को अन्य खाद्य पदार्थों में मिलाकर खाने से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी। इससे कैंसर सहित बड़ी बीमारियों से बचाव हो सकेगा। लीची के छिलके को प्रोसेस कर रंग निकालने के काम के साथ इससे फोर्टिफायड फूड’ भी तैयार किया जायेगा। इससे रोजगार और व्यापार दोनों को बढ़ावा मिलेगा।
लीची के छिलके में काफी गुण होते हैं। इसके लाल रंग को निकालकर दूसरे खाद्य पदार्थों में मिलाया जा सकता है। इससे न सिर्फ उसकी पौष्टिकता बढ़ेगी बल्कि रोग प्रतिरोधक क्षमता होने के कारण बीमारियों से भी बचा जा सकेगा। इस पर काम शुरू किया गया है।
-डॉ. डीआर सिंह, कुलपति, बिहार कृषि विश्विविद्यालय
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