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लोकसभा स्पेशल: बिहार में कभी मजबूत विपक्ष थीं लेफ्ट पार्टियां, आज सीटों को तरस रहीं, कहानी वाम दलों की…

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वामदलों ने बिहार में काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। एक समय था जब भाकपा बिहार विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल हुआ करती थी। माकपा और भाकपा माले का भी कई क्षेत्रों में प्रभुत्व रहा। हालांकि, समाजवादी दलों और नेताओं के उदय से वाम दल कमजोर होते चले गए। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के इतिहास में कई ऐसे मौके आए, जब बिहार में वामदलों को सीटों के लाले पड़ गए। वाम सियासत में बिखराव ने भी इनकी जड़ें खोदीं। हालांकि, महागठबंधन में शामिल होने से तीनों वामदलों को संजीवनी मिली है।

बिहार में वामदलों का इतिहास देखें तो सबसे पुरानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी भाकपा है। 1960-70 के दशक में पार्टी बिहार में चरम पर थी। यह इसका स्वर्णिम युग रहा। 1972 में 35 सीट जीतकर विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल रही। इसी दौर में पार्टी में टूट हुई और 1964 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का उदय हुआ। चुनावों में इसने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। हालांकि, 80 के दशक में मध्य और दक्षिण बिहार में वामपंथी राजनीति नक्सलवाद के रूप में एक करवट लेने लगी थी।

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शुरुआती दौर में आईपीएफ, एमसीसी, जैसे कई नक्सली संगठन चुनाव बहिष्कार और गैर संसदीय संघर्ष के नारे के साथ अलग-अलग इलाकों में सक्रिय थे। इन्हीं में से एक भाकपा माले ने आईपीएफ के बैनर से 1989 में आरा संसदीय सीट और 1990 में विधानसभा में सात सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया। धीरे-धीरे उसने मध्य और दक्षिण बिहार में अपनी जड़ें जमा ली। अभी वामपंथ के तीनों धड़े बिहार में सक्रिय हैं। तीनों ही दल गरीबों, मजदूरों, पिछड़ों व दलितों की राजनीति कर रहे हैं।

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वामदलों के कई चेहरे बिहार की सियासत की पहचान रहे। सुनील मुखर्जी, चंद्रशेखर सिंह, जगन्नाथ सरकार, इंद्रजीत सिन्हा, चतुरानन मिश्र, भोगेंद्र झा, रामअवतार शास्त्री, राजकुमार पूर्वे, अंबिका प्रसाद भाकपा की पहचान रहे हैं। अजीत सरकार माकपा के कद्दावर नेता थे। जनता दल के सत्ता में आने और लालू प्रसाद के मुख्यमंत्री बनने के बाद 90 के दशक से वाम दलों की शक्ति क्षीण होने लगी। लालू ने वामपंथी दलों के आधार वाले बड़े तबके को अपने पक्ष में कर लिया।

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इसके बाद नीतीश कुमार और रामविलास पासवान ने भी अतिपिछड़े, पिछड़े और दलित तमाम जातियों की गोलबंदी कर वामपंथी दलों की बची-खुची जमीन अपने नाम कर ली। बाद के दिनों में हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा, उपेंद्र कुशवाहा के उदय से भी इनके वोट बैंक में सेंध लगी। तभी से वामदल बिहार में मंडलवादी राजनीति से उभरे दलों के पिछलग्गू बनते गए। अब उन्हीं के सहारे इनकी चुनावी नैया भी पार लगती है।

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वामदलों को कांग्रेस और लालू प्रसाद का साथ फायदेमंद रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाकपा ने जदयू के साथ गठबंधन किया था। उससे पहले 1967 में कांग्रेस के खिलाफ बने पहले गैरकांग्रेसी गठबंधन में भाकपा शामिल थी। तब महामाया सरकार में इंद्रजीत सिन्हा, चंद्रशेखर सिंह कद्दावर मंत्री होते थे। भाकपा ने 1970 के दशक में कांग्रेस के साथ भी गठबंधन किया। उसके बाद 1990 के दशक में वामदल जनता दल के साथ रहे। तब भी पार्टी को अच्छी सफलता मिली। बाद के दिनों में जब स्थिति कमजोर हुई तो तीनों वाम दल एक साथ आकर चुनाव लड़े।

2015 का विधानसभा चुनाव तीनों ने साथ मिलकर लड़ा था। हालांकि तीन सीटों पर सफलता केवल भाकपा माले को मिली थी। 2020 में जब कांग्रेस, राजद और वामदलों का गठबंधन बना तो 16 सीटों पर कब्जा किया। भाकपा माले ने 2020 चुनाव में युवाओं को मौका दिया। उसकी पार्टी के 12 विधायकों में से ज्यादातर युवा हैं। अन्य दोनों दलों में दूसरी पंक्ति के नेता उभर नहीं पाए। युवा उपेक्षित रहे। छात्र व युवा संगठनों तक ही भूमिका रही। यही कारण है कि इन्हें नए क्षेत्रों में विस्तार के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है।

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हालांकि, भाकपा राज्य सचिव रामनरेश पांडेय कहते हैं कि पार्टी ने युवाओं को महत्वपूर्ण जिम्मेवारी दी है। बेगूसराय में छात्रों का राष्ट्रीय सम्मेलन कराकर नए चेहरे को सामने लाया गया है। एक समय भाकपा बिहार विधानसभा में हुआ करती थी मुख्य विपक्षी दल, राज्य में समाजवादी दलों और मंडलवादी राजनीति के उभार ने वामपंथी दलों के बड़े वोट बैंक में सेंध लगाई।

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