बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर जाति गणना की रिपोर्ट के आधार पर हिस्सेदारी देने का दबाव बढ़ने लगा है। अब जेडीयू के मुस्लिम नेता ने जाति गणना रिपोर्ट के आधार पर मुसलमानों को सरकार और पार्टी में हिस्सेदारी देने की मांग कर दी है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि जब 3 फीसदी आबादी वाला नेता (नीतीश कुमार) सरकार चला रहा है, तो हम (मुस्लिम) 18 परसेंट हैं।
जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्व राज्यसभा सांसद गुलाम रसूल बलियावी ने कहा कि जाति गणना रिपोर्ट के आधार पर बिहार में मुस्लिमों की आबादी लगभग 18 फीसदी है। अगर 3 फीसदी आबादी वाला नेता सरकार चला सकता है और 14 फीसदी आबादी वाले समुदाय से एक डिप्टी सीएम और 9 मंत्री हो सकते हैं, तो मुसलमानों को भी संख्या के आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
बलियावी ने सीतामढ़ी में तहरीक ए बेदारी के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गुरुवार शाम को यह बयान दिया। उन्होंने जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी हिस्सेदारी का नारा भी बुलंद किया। यह नारा सबसे पहले समाज सुधारक और बसपा के संस्थापक दिवंगत कांशीराम ने सबसे पहले दिया था। अब यह बिहार के सत्तारूढ़ जेडीयू और आरजेडी के महागठबंधन को परेशान करने लगा है।
नीतीश सरकार द्वारा हाल ही में जारी हुई जाति गणना की रिपोर्ट के आधार पर बिहार की आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 17.7 प्रतिशत है। इसमें ईबीसी और उच्च जाति के मुस्लिम भी शामिल हैं। 2 अक्टूबर को जारी बिहार जाति सर्वेक्षण रिपोर्ट से पता चलता है कि मुस्लिमों में अगड़ी जातियों की आबादी हिंदुओं के मुकाबले ज्यादा है। मुस्लिमों में जहां 27 प्रतिशत लोग अगड़ी जाति के हैं, वहीं हिंदुओं में सवर्ण जातियों की आबादी महज 10.6 फीसदी है।
अपने विवादित बयानों से सुर्खियों में रहने वाले बलियावी ने आगे कहा कि जाति आधारित गणना से यह साफ हो गया है कि मुसलमानों की संख्या सबसे ज्यादा है। ऐसे में सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मंत्रालय, सचिवालय, कलेक्ट्रेट, पुलिस, स्कूल और कॉलेजों में मुसलमानों की हिस्सेदारी बढ़ाई जाए।
जेडीयू के पूर्व एमएलसी ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि अगर सरकारों ने अत्याचार नहीं किया होता तो सच्चर कमेटी की रिपोर्ट उनके बच्चों को पढ़ने के लिए उपलब्ध होती। दुनिया के अन्य समुदायों के साथ मुसलमानों के बच्चे भी डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस और आईपीएस बनते। हमें विरासत में मिली कपड़ा बुनाई और हथकरघा की कला को नष्ट कर दिया गया और रोजगार के साधन छीन लिए गए।
इसी तरह पसमांदा मुस्लिम महाज के संस्थापक एवं पूर्व जेडीयू सांसद अली अनवर ने भी मुसलमानों की हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग का समर्थन किया है। पसमांदा का अर्थ है ‘जो पीछे रह गए’, इसमें दलित और पिछड़े मुस्लिम शामिल हैं। पसमांदा एक वर्ग को दर्शाता है, किसी जाति को नहीं।
अली अनवर ने कहा कि पसमांदा मुसलमानों को वाकई कभी उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। एक या दो जातियों से ही सांसद बनाए जाते हैं। पूरे मुस्लिम समुदाय में पसमांदा को दरकिनार किया जाता है। मुसलमानों को जो भी प्रतिनिधित्व मिलता है, वे ज्यादातर ऊंची जाति के होते हैं।
बिहार की जातिगत गणना रिपोर्ट पर नजर डालें तो पता चला कि अधिकांश मुसलमान ईबीसी समूह के हैं। राज्य की लगभग 73 प्रतिशत मुस्लिम आबादी को पिछड़ा वर्ग या पसमांदा के रूप में वर्गीकृत किया गया है। उन्हें आरक्षण का लाभ भी मिलता है।
वहीं, जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन ने पार्टी के मुस्लिम नेताओं की इन मांगों के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समाज के सभी लोगों के लिए काम कर रहे हैं। वह समाज के विभिन्न वर्गों के लिए काम कर रहे हैं और किसी को भी उपेक्षित महसूस नहीं करना चाहिए।
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