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आज 57 वर्ष का हुआ समस्तीपुर रेल मंडल, बदलते दौर के साथ विकास की नई पटरी

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समस्तीपुर : छोटी लाइन और सीमित सुविधाओं से शुरू हुआ समस्तीपुर रेल मंडल का सफर आज विद्युतीकरण, दोहरीकरण, आधुनिक सिग्नलिंग, इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग, कवच और अमृत भारत स्टेशन योजना तक पहुंच चुका है। पांच सितंबर 1969 को अस्तित्व में आया समस्तीपुर रेल मंडल अपने गौरवपूर्ण सफर के 57 वर्ष पूरे कर रहा है। इन वर्षों में मंडल ने रेल सुविधाओं और तकनीक के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे हैं। उत्तर बिहार के रेल इतिहास में समस्तीपुर की पहचान केवल रेल मंडल मुख्यालय तक सीमित नहीं है। यह मिथिला, तिरहुत, चंपारण और कोसी क्षेत्र को देश के विभिन्न हिस्सों से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण रेल कड़ी के रूप में अपनी भूमिका निभाता रहा है। बदलती जरूरतों के साथ मंडल के रेल नेटवर्क और यात्री सुविधाओं में भी लगातार विस्तार हुआ है।

हालांकि समस्तीपुर रेल मंडल का इतिहास इसके गठन से करीब एक सदी पहले से जुड़ा है। उत्तर बिहार में रेल सेवा की शुरुआत 19वीं सदी में हुई थी। समस्तीपुर-दरभंगा रेलखंड पर 17 अप्रैल 1874 को पहली बार मालगाड़ी का ट्रायल किया गया था। इसके बाद एक नवंबर 1875 से इस रेलखंड पर यात्री ट्रेनों का परिचालन शुरू हुआ। समय के साथ समस्तीपुर मंडल के रेल नेटवर्क में तकनीकी बदलाव आते गए। छोटी लाइन से शुरू हुई रेल सेवा आज इलेक्ट्रिक ट्रेनों तक पहुंच चुकी है।

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आधुनिक सिग्नलिंग, इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग और सुरक्षा तकनीक के रूप में कवच जैसी व्यवस्थाओं को भी रेल नेटवर्क में शामिल किया जा रहा है। वहीं, अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत स्टेशनों को आधुनिक और यात्री सुविधाओं से लैस करने की दिशा में काम जारी है। 57 वर्षों की इस यात्रा में समस्तीपुर रेल मंडल ने न केवल अपने नेटवर्क का विस्तार किया, बल्कि उत्तर बिहार के सामाजिक, आर्थिक और व्यावसायिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आने वाले समय में आधुनिक तकनीक और बेहतर यात्री सुविधाओं के साथ मंडल के विकास को नई गति मिलने की उम्मीद है।

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