समस्तीपुर : तीन दिनों बाद भी न्याय और अंतिम संस्कार की बाट जोह रही महिला की लाश, 10 वर्षीय बेटे की आंख अपनों के इंतजार में पथरायी

समस्तीपुर : तीन दिनों तक पोस्टमार्टम हाउस में पड़ी एक महिला की लाश न सिर्फ एक परिवार के टूटने की कहानी है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या व्यवस्था इतनी संवेदनहीन हो गई है कि मरने के बाद भी किसी को अपनाने वाला नहीं है। दरअसल नगर थाना क्षेत्र के बारह पत्थर मोहल्ले में मंगलवार की सुबह किराये के मकान से संदिग्ध हालत में महिला का शव बरामद किया गया था। घटना के तीन दिन बीत जाने के बावजूद अब तक शव के अंतिम संस्कार के लिए लेने कोई नहीं आया है।
सदर अस्पताल स्थित पोस्टमार्टम हाउस में शव यूं ही पड़ा हुआ है, जो व्यवस्था और सामाजिक संवेदनहीनता दोनों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। मृतका की पहचान अंगारघाट थाना क्षेत्र के अंगार गांव निवासी शैलेश पासवान की पत्नी पूनम कुमारी के रूप में हुई थी। पुलिस ने घटना के दिन ही शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए सदर अस्पताल भेज दिया था, ओर महिला के ससुराल में इसकी सूचना भी दी। लेकिन तीन दिन गुजर जाने के बाद भी न तो पति सामने आया और न ही ससुराल पक्ष ने शव को अपनाने की पहल की है।

बताया जाता है कि पति पहले से ही पत्नी को छोड़कर कहीं और रह रहा है, जबकि ससुराल वालों ने भी शव लेने से साफ इनकार कर दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि एक तरफ महिला की मौत रहस्य बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर उसका शव पोस्टमार्टम हाउस में पड़े रहना मानवीय संवेदना को झकझोरने वाला है। नियम के अनुसार पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को शव सौंपा जाना चाहिए, लेकिन परिजनों के आगे न आने के कारण स्थिति जस की तस बनी हुई है। घटना के 72 घंटों बाद अस्पताल प्रबंधन शव के अंतिम संस्कार की तैयारी में जुट गया है।

इधर, मृतका का दस वर्षीय पुत्र पंकज कुमार मां की मौत के बाद पूरी तरह अनाथ हो गया है। किसी अपने के आने के इंतजार में उसकी आंखे पथरा गयी है। फिलहाल वह मकान मालिक के पास है और पुलिस उसे चाइल्ड लाइन को सौंपने की प्रक्रिया में जुटी हुई है। एक ओर मासूम का भविष्य अधर में है, दूसरी ओर मां का शव तीन दिनों से अंतिम विदाई का इंतजार कर रहा है। इधर नगर थानाध्यक्ष अजीत कुमार का कहना है कि परिजनों से लगातार संपर्क करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन वह लोग आगे नहीं आ रहे हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इधर प्रशासन द्वारा 72 घंटे बीत जाने के बाद शव के अंतिम संस्कार की भी व्यवस्था की जा रही है।

मृतका पूनम एक पत्नी, एक बहू व एक मां अब सिर्फ एक फाइल नंबर बनकर रह गई है। पति पहले ही जीवन की राह से मुंह मोड़ चुका था और अब मौत के बाद ससुराल वालों ने भी उससे रिश्ता तोड़ लिया है। किसी ने आगे बढ़कर यह नहीं कहा कि “यह हमारी बहू है, हमारी जिम्मेदारी है।” नतीजा यह कि तीन दिन बीत जाने के बाद भी उसका शव सदर अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस की ठंडी दीवारों के बीच पड़ा है।

पूनम की कहानी सिर्फ उसकी मौत तक सीमित नहीं है। यह उस दस वर्षीय बेटे पंकज की कहानी भी है, जिसने अपनी मां को सोते हुए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए खामोश होते देखा। वही मासूम रोना, जो खिड़की से बाहर गूंजा था, आज भी सवाल बनकर तैर रहा है। मां तो चली गई, अब मेरा कौन है? मां का शव पोस्टमार्टम हाउस में पड़ा है और बेटा जीवन के सबसे कठिन मोड़ पर अकेला खड़ा है।
नियम, प्रक्रिया और कागजों के बीच कहीं मानवीय संवेदना दम तोड़ती दिख रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है, कानूनी औपचारिकताएं बाकी हैं, लेकिन इन सबके बीच एक स्त्री की अंतिम यात्रा रुकी हुई है। वह यात्रा, जिसे परिजनों के कंधे मिलने चाहिए थे, अब शायद प्रशासन की जिम्मेदारी बनकर रह जाएगी।पोस्टमार्टम हाउस में पड़ा यह शव सिर्फ एक शव नहीं है। यह समाज के उस आईने की तरह है, जिसमें रिश्तों की सच्चाई, व्यवस्था की बेरुखी और संवेदना की कमी साफ झलकती है। तीन दिन से अंतिम विदाई की प्रतीक्षा करती पूनम का शव बहुत कुछ कह रहा है काश, सुनने वाला कोई होता।



