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आजादी के दीवानों का गढ़ था विद्यापतिनगर ; क्रांतिकारी गतिविधियों से हलकान ब्रिटिश शासकों ने की थी बिहार लाईट हार्स पलटन की तैनाती

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समस्तीपुर/विद्यापतिनगर [पदमाकर सिंह लाला] : जब देश भर में आजादी के दीवानों ने जब ब्रिटिश शासकों को उखाड़ फेंकने का शंखनाद किया तो विद्यापतिनगर के वीर सपूत भी सैकड़ों की संख्या में स्वतंत्रता संग्राम में कूद पडे़। इसके बाद नित्य-प्रतिदिन सरकारी संपत्तियों को नष्ट करने का सिलसिला परवान चढ़ने लगा।

इससे आहत अंग्रेजी शासकों ने स्थानीय क्रांतिकारी गतिविधियों से त्रस्त होकर विद्यापतिनगर में ‘बिहार लाइट हार्स पलटन’ की विशेष टुकड़ी की तैनाती कर आंदोलन को दबाने की पूरजोर कोशिश की थी। लेकिन तक तक विद्यापतिनगर का पूरा इलाका आंदोलनकारियों का गढ़ बन चुका था। कई महान क्रांतिवीरों ने यहां स्वयं पहुंचकर क्रांति की अलख जगायी।

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इस दौरान वर्ष 1914-16 के दौरान नीलहे किसानों की समस्याओं एवं ‘तीन कठिया’ प्रथा के विरोध में प्रखंड के गोपालपुर निवासी नूनू प्रसाद सिंह की अगुवाई में एक सशक्त राष्ट्रीय किसान आंदोलन चलाया गया। इस आंदोलन के तहत अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का टैक्स, मालगुजारी व तीन कठिया प्रथा का विरोध करने का फैसला लिया गया। इस फैसले के बाद ब्रिटिश हुक्मरान विचलित हो गये। उसने अपने दमन चक्र से वंदे मातरम् के जायघोष को ठंडा करने की कई रणनीतियों को अंजाम देना शुरू कर दिया।

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दूसरी ओर स्थानीय आंदोलनकारियों के गुट ने गुप्त योजना बनाकर आंदोलनात्मक रणनीति को मुकाम पर पहुंचाने का कार्य जारी रखते हुए कई अविस्मरणीय घटनाओं को अंजाम तक पहुंचाया। वर्ष 1942 में शुरू भारत छोड़ो आंदोलन के शंखनाद ने स्थानीय आंदोलनकारी सपूतों में नई ऊर्जा का संचार किया। विद्यापतिनगर व दलसिंहसराय के रेलवे स्टेशन पर वीरों ने भारी क्षति पहुंचाते हुए रेल पटरियां ऊखाड़ फेंकी। रजिस्ट्री व पोस्ट ऑफिस को स्वाहा कर दिया। 15 अगस्त 1942 को तत्कालीन दलसिंहसराय थाना पर तिरंगा फहराने पहुंची हजारों की भीड़ का नेतृत्व शिवनंदन सिंह, जोगी झा, अयोध्या सिंह, सत्यनारायण सिंह, सतपाल मिश्र, नागेश्वर प्रसाद सिन्हा, रामपुकार सिंह, बालदेव सिंह, ननू प्रसाद सिंह, अलख सिंह, पहलवान राघो सिंह, राम गोविंद सिंह, रामेश्वर सिंह, रामदेव सिंह, शीतल सिंह, जयनंदन महतो, रामचरित्र चौधरी, परमेश्वरी सिंह, जयनंदन सिंह,स्व. भगवान सिंह ,चंद्रमणि प्रसाद सिंह,रामयतन सिंह आदि ने किया। तिरंगा ध्वज फहराने से गुस्सायी हजारों की भीड़ पर ब्रिटिश शासकों ने गोलियों की बौछाड़ करवा दी। जिसमें कई क्रांति वीरों ने अपने प्राणों की आहूति दे दी। इसमें परमेश्वरी महतो, जगेश्वर लाल, चैता पोद्दार, योगी झा के नाम शामिल हैं।

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9 नवंबर 1928 को क्रांति वीरों ने गोरखा साम्राज्य के खिलाफ आंदोलन को अंजाम देने की खातिर प्रखंड के धन-संपन्न कष्टहारा निवासी धारी तिवारी के बंगला में डकैती की घटना को अंजाम दिया। प्रखंड के सिमरी गांव के बाबू धरणीधर प्रसाद चम्पारण आंदोलन में महात्मा गांधी के प्रमुख सहयोगियों में एक थे। लब्ध वकील के साथ-साथ महात्मा गांधी के राजनीतिक सलाहकार की भूमिका में भी धरणीधर बाबू ने अहम् योगदान दिया। वे कई वर्षो तक जेल में भी रहे।

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हरपुर बोचहा के वर्तमान मुखिया प्रेम शंकर सिंह के पिता मैथिली शरण सिंह गांव के युवाओं में स्वतंत्रता की लड़ाई में योगदान देने हेतु बीज रोपण करते थे। आजादी के दीवानों का प्रमुख गढ़ रहे मऊ गांव के योगी झा ने तो केवटा कोठी में जबरन घुस कर न केवल तिरंगा ध्वज लहराया बल्कि अंग्रेजों की रिवाल्वर समेत कई उपयोगी हथियार व नक्शा लूट लिया। वे कई वर्षों तक जेल में भी रहे। रामखेलावन भगत, रामदेव सिंह राम उतिच साह, रामेश्वर सिंह, पहलवान राघो सिंह, राम गोविंद सिंह के घर स्वत्रंत चन्द्रेश्वर आजाद व योगेन्द्र शुल्क ने पहुंचकर इन लोगों के बीच अलख जगाया था।

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मऊ के नामी गिरामी पहलवान रामगोविंद सिंह का विशेष प्रकार का हथियार (बाण।) की धमक से अंग्रेजी हुकूमत सिहर जाती थी। थाना कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नागेश्वर सिन्हा वर्ष 1936-42 तक जेल गये। बढ़ौना गांव के शिक्षक देवेन्द्र ठाकुर व सिमरी के जयनंदन महतो को अंग्रेजी हुकुमत ने उनकी राजनीतिक सक्रियता के वजह से क्रमश: 5 व 3 वर्षो तक की जेल की सजा के साथ अर्थदंड दिया था। मऊ गांव के प्रख्यात शिक्षाविद् सूर्य नारायण सिंह ने दर्जनों स्वतन्त्रवीरों को रणनीतिक /राजनीतिक कौशल विकसित करने हेतु शिक्षा प्रदान किया करते थे।

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