समस्तीपुर: बांस का सामान बनाने वाले मल्लिक समाज को भी मिले सरकारी संरक्षण व सुविधा

समस्तीपुर : सदियों से बांस से बनी डलिया, झपिया, दउरा आदि हमारे धार्मिक और पारंपरिक आयोजनों का हिस्सा हैं। इनके बिना कोई भी अनुष्ठान संभव नहीं है। छठ, तीज, जीउतिया आदि त्योहारों और लगन में इनकी डिमांड चरम पर रहती है। चिंता की बात यह है कि जब त्योहार नहीं होत ओर लगन खत्म हो जाते हैं तो इन्हें बनाने वालों की आजीविका पर संकट हो जाता है। बांस की कारीगरी करने वाले मल्लिक समाज की कला वर्तमान में दम तोड़ने लगी है। शादी, ब्याह में बांस से बने सामान हमारी शान में शामिल थे लेकिन अब यही सामान मल्लिकों के यहां धूल फांकते नजर आ रहे हैं।
कारण महंगे होने के कारण बांस से बने सामानों की कीमत भी बढ़ गई है, ऐसे में सस्ता सामान खरीदने वालों ने इसके विकल्प के तौर पर प्लास्टिक का सामान खरीदना शुरू कर दिया है। प्लास्टिक के सस्ते विकल्प और सरकारी अफसरों की उदासीनता ने इस परम्परागत हुनर को गहरी मात दी है। नतीजा इनका दिहाड़ी निकालना भी मुश्किल हो जाता है। मल्लिक समाज के परिवार अपनी परम्परागत कारीगरी के अलावा कुछ और करना भी नहीं जानते, न इनके पास अपना घर है और न सरकारी सुविधाएं।

जिले के हर प्रखंडों में इनकी आबादी है। आज भी झुग्गी, झोपड़ी बनाकर रहने वाले मल्लिक समाज का अधिकांश परिवार बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर हैं। रोसड़ा में गर्ल्स हाई स्कूल मोड़ के समीप करीब एक दर्जन से अधिक मल्लिक परिवार कई पुश्तों से रहते हैं। मल्लिक समाज के परिवार बांस से डलिया, झपिया, दउरी आदि सामान बनाकर बेचते हैं। यह सिर्फ इनका रोजगार नहीं है बल्कि यही इनकी पहचान भी है लेकिन वर्तमान में इन परिवारों के सदस्य अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं। सड़क के फुटपाथ इनके घर हैं और यही इनकी दुकान भी है।

नैना देवी और राधा कुमारी ने बताया की हम पीढ़ियों से यही काम करते आए हैं, पहले हमारी बनाई झपिया, डलिया, दौरी आदि की बाजारों में डिमांड रहती थी लेकिन आधुनिकता के दौर में सब कुछ बदल गया है। अब लोग वैवाहिक आयोजनों और पूजा, पाठ में प्लास्टिक के सामान प्रयोग करने लगे हैं। इससे हमारा पुस्तैनी कारोबार खत्म होने की कगार पर है। वहीं राजेन्द्र मल्लिक ने बताया की सरकारें दावा करती हैं कि हम समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचा रहे हैं लेकिन हम आज भी वहीं खड़े हैं जहां कई पीढ़ी पहले थे। मल्लिक समाज के उत्थान के लिए अब तक कोई प्रयास ही नहीं किया गया।

मल्लिक समाज की पूजा देवी, सपना देवी, सुनीता देवी कहती हैं कि एक समय था जब शादी, त्योहार, पूजा, पाठ और सार्वजनिक आयोजनों में मिठाई और उपहार देने सहित घरेलू कामों में भी बांस से बने सामानों का प्रयोग किया जाता था। इससे हमारी बिरादरी वालों की सम्मानजनक कमाई हो जाती थी और परिवार का आसानी से भरण पोषण हो जाता था। जब से बाजार में प्लास्टिक से बने सामानों का चलन बढ़ा है बांस से बनी डलिया और झापी का बाजार से गुम होते जा रहे हैं। इससे बांस से बने सामान खरीदने वालों की संख्या तेजी से घट रही है।

बोले जिम्मेदार :
मल्लिक समाज के उत्थान के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। मुख्यमंत्री पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग कौशल विकास योजना, मुख्यमंत्री अति पिछड़ा वर्ग नागरिक सेवा प्रोत्साहन योजना सहित अन्य योजनाएं हैं। इसमें काई परेशानी से इस समाज के लोग कार्यालय अवधि में मिल सकते है।
-विवेक कुमार, जिला प्रबंधक उद्योग विभाग



