बिहार सरकार के पशु नस्ल सुधार कार्यक्रम के तहत कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है। इससे पशुपालकों के घर सिर्फ बछिया ही पैदा होगी। इतना ही नहीं दुधारू और मौसम अनुकूल नई नस्ल की गायें होंगी तो पशुधन की अहमितय बढ़ेगी। पशुपालक भी बाछी (हिपर) प्रजनन से खुश होंगे। सीमेन सेंटर में मवेशी पालक मनचाहे नस्ल के स्ट्रा से गाय का प्रजनन कराने भी लगे हैं। भागलपुर के पशु चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. गोपाल कृष्ण कन्हैया बताते हैं, पशुपालकों के घर अब नई नस्ल की बाछी ही जन्म लेंगी।
इसको लेकर बिहार के प्रमुख जिलों में सीमेन सेंटर की सुविधा सरकार ने दी है। भागलपुर के पशुपालक पड़ोसी जिले पूर्णिया से स्ट्रा ले सकते हैं। पूर्णिया सीमेन सेंटर से स्ट्रा लेने पर अनुदान भी दिया जाता है। डॉ. कन्हैया बताते हैं, कृत्रिम विधि से नर पशु से सीमेन (वीर्य) एकत्रित करके मादा पशु की प्रजनन नली में रखने की प्रक्रिया को कृत्रिम गर्भाधान कहते हैं। कृत्रिम गर्भाधान के लिए एक स्ट्रॉ को 30-40 डिग्री सेल्सियस के गर्म स्नान में पिघलाया जाता है।
पिघलने के बाद, इसे एक प्लास्टिक इंजेक्टर (कैसोगन) में लोड किया जाता है। जिसे फिर कृत्रिम गर्भाधान करने के लिए मादा मवेशियों के आंतरिक गर्भाशय छिद्र या गर्भाशय लुमेन में इंजेक्ट किया जाता है। सीमेन तैयार करते समय ही विशेषज्ञ एक्स क्रोमोजोम बाहर निकाल देता है। वाई शेष रह जाता है, इससे सिर्फ मादा भ्रूण ही तैयार होता है।
जिला पशुपालन पदाधिकारी डॉ. रंधीर कुमार बताते हैं, कृत्रिम गर्भाधान के साथ एक सांड प्रति वर्ष 20,000 से अधिक गायों का प्रजनन कर सकता है। प्राकृतिक सेवा के साथ 200 से अधिक गायों को प्रजनन नहीं किया जा सकता है। एक हिमिकृत वीर्य डोज स्ट्रॉ (0.25 मिलीलीटर क्षमता) एक पशु के सफल गर्भधारण के लिए पर्याप्त है। यदि सही समय पर पशु के गर्मी (हीट) में आने पर उत्तम गुणवत्ता के वीर्य का उपयोग करके तथा एसओपी का पालन करते हुए सही तकनीक का उपयोग करके एआई किया गया हो।
अब तो पशु चिकित्सक भी देसी सांड से मैटिंग (सहवास) नहीं कराने की सलाह देते हैं। देसी सांड के सीमेन में कई तरह के वायरस से गाय में बांझपन की शिकायत के मद्देनजर कृत्रिम गर्भाधान की ओर पशुपालकों का जोर है। पशुपालकों की शिकायत रहती थी कि देसी सांड से मैटिंग के बाद बछड़ा पैदा लेने की संभावना अधिक रहती है। पहले बैल का उपयोग खेती-किसानी में भी हो जाता था। अब बैल की उपयोगिता खेतों की जुताई या बोझा ढोने के लिए बैलगाड़ी में समाप्त हो गई है। इसलिए किसान बछड़ा को खुले में छोड़ देते हैं। बंध्याकरण नहीं होने से ये बछड़ा बाद में सांड बन जाता है। जो अब मैटिंग के काम भी नहीं आ रहा है।
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